Suvendu Adhikari Marriage: पश्चिम बंगाल की राजनीति के शिखर पर पहुंचे शुभेंदु अधिकारी अक्सर अपने निजी जीवन को लेकर चर्चा में रहते हैं। हल्दिया की एक विशाल जनसभा में उन्होंने जनता के बीच उस सवाल का जवाब दिया जो अक्सर उनके समर्थकों और विरोधियों के मन में कौंधता है— “जब उनके भाई शादीशुदा हैं, तो उन्होंने अब तक विवाह क्यों नहीं किया?” शुभेंदु ने बड़ी सादगी से स्पष्ट किया कि उनका जीवन पूरी तरह से राजनीति और जनसेवा की वेदी पर समर्पित है। उन्होंने साफ कहा कि वह खुद को ‘अकेला’ नहीं मानते, बल्कि पूरा समाज और उनका राजनीतिक दायित्व ही उनका असली परिवार है।
पिता शिशिर अधिकारी की नाराजगी
बताते चले कि, शुभेंदु के अविवाहित रहने के इस कठोर निर्णय से उनके पिता और वरिष्ठ राजनेता शिशिर अधिकारी शुरुआत में काफी व्यथित और क्रोधित थे। एक पुराने इंटरव्यू में शिशिर अधिकारी ने खुलासा किया था कि उन्होंने इस बात पर अपने बेटे को कड़ी फटकार लगाई थी। ग्रामीण परिवेश और पारंपरिक समाज में यह अपेक्षा की जाती है कि कुल का दीपक शादी कर परिवार को आगे बढ़ाएगा। शिशिर जी को चिंता थी कि परिवार की विरासत और सम्मान को अगली पीढ़ी तक कौन ले जाएगा। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नाराजगी के बावजूद उन्होंने कभी बेटे पर हाथ नहीं उठाया, वह केवल एक पिता की स्वाभाविक चिंता थी।
1987 से छात्र राजनीति का सफर
आपको बता दे कि, शुभेंदु अधिकारी ने एक टेलीविजन साक्षात्कार के दौरान अपनी जीवन यात्रा के पन्ने पलटते हुए बताया कि उनके इस निर्णय के पीछे दशकों की तपस्या है। साल 1987 से ही वे छात्र राजनीति की मुख्यधारा में कूद पड़े थे। जैसे-जैसे राजनीति के प्रति उनका जुड़ाव बढ़ता गया, व्यक्तिगत इच्छाएं गौण होती चली गईं। उन्होंने महसूस किया कि एक पूर्णकालिक राजनेता के रूप में लोगों की समस्याओं का समाधान करना ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। इसी समर्पण भाव ने उन्हें सांसारिक बंधनों और वैवाहिक जीवन से दूर रखा, ताकि वे चौबीसों घंटे जनता के लिए उपलब्ध रह सकें।
महान स्वतंत्रता सेनानियों से मिली प्रेरणा
अपने अविवाहित रहने के संकल्प को शुभेंदु अधिकारी ने महान आदर्शों से जोड़ा है। उन्होंने बताया कि उनके क्षेत्र (मेदिनीपुर) के तीन दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी— सतीश सामंत, सुशील धारा और अजय मुखर्जी— भी आजीवन अविवाहित रहे थे। इन महापुरुषों के त्याग और राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण ने शुभेंदु को गहराई से प्रभावित किया। उन्हीं की राह पर चलते हुए शुभेंदु ने तय किया कि पारिवारिक जिम्मेदारियों के अभाव में वे अपनी पूरी ऊर्जा और समय जनहित के कार्यों में लगा पाएंगे। उनके लिए ये महापुरुष ही राजनीति के असली रोल मॉडल हैं।
माता-पिता की सेवा ही परम धर्म
बिना शादी के जीवन जीने का एक बड़ा तर्क शुभेंदु यह देते हैं कि इससे उन्हें जनता के लिए ‘अतिरिक्त समय’ मिलता है। हालांकि, वह अपने पारिवारिक कर्तव्यों से पूरी तरह विमुख नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल करना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता और जिम्मेदारी है। इसके साथ ही, उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही कि वह परिवार के किसी भी सदस्य को राजनीति में लाकर सत्ता का अनुचित लाभ उठाने के सख्त खिलाफ हैं। उनके अनुसार, अविवाहित रहकर वे परिवारवाद के आरोपों से मुक्त होकर शुद्ध सेवा भाव से कार्य कर पा रहे हैं।










