Bengal Voter List Row: ‘वोटर लिस्ट सुधार की प्रक्रिया बंगाल में अन्य राज्यों से अलग’, सुप्रीम कोर्ट ने बताया क्यों खास है यह मामला!

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से लाखों नाम हटने के विवाद पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यहाँ की पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) अन्य राज्यों के मुकाबले बिल्कुल अलग है। 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' के आधार पर हो रही इस छंटनी ने सियासी और कानूनी पेच फंसा दिया है। आखिर क्या है बंगाल की इस प्रक्रिया का राज?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 13, 2026

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Bengal Voter List Row:  पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने उन मतदाताओं की याचिकाओं पर सुनवाई की, जिन्हें सूची से बाहर कर दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में एक-एक वोट की कीमत होती है, इसलिए अपीलीय प्रक्रिया का मजबूत और सटीक होना अनिवार्य है।

मजबूत अपीलीय तंत्र की आवश्यकता पर जस्टिस बागची का जोर

जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान राज्य में एक सशक्त अपीलीय फोरम की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने न्यायिक अधिकारियों की कार्यक्षमता और समयसीमा पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब एक अधिकारी को प्रतिदिन 1000 से अधिक दस्तावेजों की जांच करनी पड़ती है, तो 100 प्रतिशत सटीकता की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है। उनके अनुसार, ऐसी स्थिति में यदि 70 प्रतिशत सटीकता भी प्राप्त होती है, तो उसे उत्कृष्ट माना जाएगा, लेकिन फिर भी बड़ी संख्या में गलतियां होने की संभावना बनी रहती है। इसीलिए सूची से बाहर किए गए लोगों के दावों के निस्तारण के लिए एक भरोसेमंद तंत्र जरूरी है।

जीत का मार्जिन और लिस्ट से बाहर वोटर्स: एक बड़ी चिंता

अदालत ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक चिंता साझा करते हुए कहा कि अगर चुनाव में जीत का अंतर (मार्जिन) उन मतदाताओं की संख्या से कम रहा जिन्हें लिस्ट से बाहर रखा गया है, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर प्रश्न खड़ा करेगा। जस्टिस बागची ने उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि किसी क्षेत्र में जीत का मार्जिन 2 प्रतिशत है और वोट न दे पाने वाले लोगों का प्रतिशत 15 है, तो चुनाव परिणामों की निष्पक्षता पर प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि कोर्ट ने इस पर कोई अंतिम राय नहीं दी, लेकिन अधिकारियों को इस दिशा में सतर्क रहने की नसीहत जरूर दी।

‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ और बिहार मॉडल से भिन्नता

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने निर्वाचन आयोग को टोकते हुए कहा कि बंगाल में अपनाई जा रही एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया अन्य राज्यों से काफी अलग है। उन्होंने विशेष रूप से ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ (तार्किक विसंगति) नामक नई श्रेणी पर सवाल उठाए। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि चुनाव आयोग बिहार में लागू उस प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहा है, जिसमें 2002 के चुनाव में मतदान करने वालों को दोबारा दस्तावेज जमा करने से छूट दी गई थी। आयोग के वकील ने इस पर सफाई दी कि मतदाताओं को दस्तावेज अपलोड नहीं करने हैं, बल्कि केवल यह साबित करना है कि वे वही व्यक्ति हैं जिन्होंने पूर्व में मतदान किया था।

2002 के वोटर्स और नाम बदलने की चुनौती

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने भी इस तकनीकी मुद्दे पर हस्तक्षेप किया। उन्होंने आयोग के पक्ष को सरल करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम 2002 की सूची में ‘XYZ’ था और अब वह ‘XYL’ के रूप में खुद को पंजीकृत कराना चाहता है, तो उसे बस यह प्रमाणित करना होगा कि वह वही पुराना मतदाता है। चुनाव आयोग ने इस पर अपनी सहमति जताई और कोर्ट को आश्वस्त किया कि ऐसे मतदाताओं की पहचान पुख्ता होने पर उन्हें सूची में शामिल करने में कोई बाधा नहीं आएगी। इससे उन पुराने मतदाताओं को राहत मिलने की उम्मीद है जिनके नामों में वर्तनी या अन्य विसंगतियां हैं।

ट्रिब्यूनल के पास लंबित 1 लाख अपीलें और कोर्ट का निर्देश

पश्चिम बंगाल में वर्तमान में 19 अपीलेट ट्रिब्यूनल कार्य कर रहे हैं, जिनमें से एक की कमान कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस संभाल रहे हैं। जस्टिस बागची ने कहा कि इन 19 जजों को ‘समावेश के सिद्धांत’ पर काम करना चाहिए क्योंकि उनके पास एक लाख से अधिक अपीलें लंबित हैं। हालांकि, याचिकाकर्ताओं द्वारा वोटर लिस्ट फ्रीज करने की तारीख आगे बढ़ाने की मांग पर सीजेआई सूर्यकांत ने सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। उन्होंने याचिकाकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिया कि वे अपनी शिकायतों और राहत के लिए गठित किए गए अपीलीय ट्रिब्यूनल का ही दरवाजा खटखटाएं। कोर्ट के इस रुख से स्पष्ट है कि अब गेंद ट्रिब्यूनल और चुनाव आयोग के पाले में है।

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