Voter List Freeze : क्या 27 लाख लोग दे पाएंगे वोट? 13 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट का महाफैसला

बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले 91 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम कटने और वोटर लिस्ट फ्रीज होने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। अब सबकी नजरें 13 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर हैं। क्या अदालत निर्वाचन आयोग को लिस्ट दोबारा खोलने का आदेश देगी?

Voter List Freeze

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 10, 2026

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Voter List Freeze :  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की दहलीज पर खड़े राज्य में मतदाता सूची को लेकर कानूनी संग्राम तेज हो गया है। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची को ‘फ्रीज’ करने के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अब देश की सर्वोच्च अदालत सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए 13 अप्रैल की तारीख मुकर्रर की है। यह मामला सीधे तौर पर उन लाखों नागरिकों के मताधिकार से जुड़ा है, जिनके नाम पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान सूची से हटा दिए गए थे।

मतदाता सूची ‘फ्रीज’ होने का अर्थ और वर्तमान संकट

निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार, मतदाता सूची को फ्रीज करने का अर्थ है कि अब चुनाव संपन्न होने तक सूची में कोई नया नाम नहीं जोड़ा जा सकता और न ही हटाया जा सकता है। बंगाल में पहले चरण की 152 सीटों के लिए यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के दौरान कई पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काट दिए गए हैं। यदि सूची फ्रीज रहती है, तो ये लोग 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में हिस्सा नहीं ले पाएंगे, जो उनके संवैधानिक अधिकार का हनन है।

सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ करेगी याचिकाओं पर विचार

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ इस संवेदनशील मामले की सुनवाई कर रही है। कोर्ट में एक वकील ने दलील दी कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ हजारों अपीलें अभी भी विभिन्न स्तरों पर लंबित हैं। चुनाव आयोग ने 9 अप्रैल को सूची पर रोक लगा दी, जिससे इन लंबित अपीलों का भविष्य अधर में लटक गया है। मुख्य न्यायाधीश ने इन दलीलों को सुनने के बाद सभी याचिकाओं को एक साथ जोड़कर 13 अप्रैल को विस्तृत सुनवाई का आदेश दिया है।

चुनाव आयोग का पक्ष: 9 अप्रैल की ‘कट-ऑफ’ डेट अनिवार्य

चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक निश्चित समय सीमा (कट-ऑफ डेट) आवश्यक है, जो बंगाल के मामले में 9 अप्रैल थी। आयोग का तर्क है कि इस तारीख के बाद किसी भी नए आवेदन या याचिका पर विचार करना चुनावी प्रबंधन को अस्थिर कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों की अपीलें स्वीकार हुई हैं, उन्हें अधिकार मिले हैं, लेकिन प्रक्रिया की एक मर्यादा होती है।

‘मतदान का अधिकार स्थायी और महत्वपूर्ण’: जस्टिस बागची की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि चुनाव के संचालन में एक सीमा रेखा (डार्क लाइन) जरूर होती है, लेकिन इसके मूल में नागरिक का मतदान करने का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मतदाता सूची में नाम होना केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं बल्कि लोकतंत्र की नींव है, जो किसी भी अन्य प्रशासनिक सुविधा से अधिक महत्वपूर्ण और स्थायी है। वहीं, मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति को प्रक्रियात्मक कारणों से स्थायी रूप से मताधिकार से वंचित नहीं किया जा रहा है।

अपीलों के निस्तारण के लिए तीन सदस्यीय पैनल का प्रस्ताव

इससे पहले 6 अप्रैल को पीठ ने संज्ञान लिया था कि बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान लगभग 60 लाख दावों और आपत्तियों का निस्तारण किया जा चुका है। कोर्ट ने स्थिति की जटिलता को देखते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया था कि वे 19 न्यायाधिकरणों के लिए एक समान प्रक्रिया तैयार करने हेतु पूर्व वरिष्ठ न्यायाधीशों का एक तीन सदस्यीय पैनल गठित करें। इस पैनल का मुख्य कार्य मतदाता सूची से नाम हटाने के खिलाफ लंबित अपीलों का त्वरित और पारदर्शी समाधान निकालना है।

बंगाल चुनाव 2026 का पूरा शेड्यूल

पश्चिम बंगाल में सत्ता का संग्राम दो चरणों में संपन्न होगा। पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को और दूसरे चरण का 29 अप्रैल को निर्धारित है। पूरे राज्य की सभी सीटों के लिए मतगणना 4 मई को होगी। 13 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा, वह यह तय करेगा कि क्या उन लाखों लोगों को वोट डालने का मौका मिलेगा जिनकी अपीलें अभी अटकी हुई हैं। राज्य की राजनीतिक पार्टियां भी इस अदालती कार्यवाही पर करीब से नजर बनाए हुए हैं।

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