US Germany Troop Withdrawal : यूरोप के सुरक्षा समीकरणों में एक बड़ा भूचाल आ गया है। अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि वह जर्मनी में तैनात अपने 5,000 सैनिकों को वापस बुला रहा है। यह कदम न केवल नाटो (NATO) के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, बल्कि इससे अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच कूटनीतिक दरार भी चौड़ी हो गई है। पेंटागन का यह फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के बीच बढ़ते तनाव का सीधा परिणाम है।
ईरान युद्ध और चांसलर की टिप्पणी बना विवाद का मुख्य कारण
इस पूरे विवाद की जड़ में ईरान के साथ चल रहा संघर्ष और उस पर जर्मन चांसलर की हालिया टिप्पणी है। चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने सोमवार को बयान दिया था कि ईरान युद्ध को समाप्त करने के लिए चल रही बातचीत में ईरान लगातार अमेरिका को अपमानित कर रहा है। इस टिप्पणी ने व्हाइट हाउस को नाराज कर दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने बेहद कड़े शब्दों में प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मर्ज को ईरान पर अपना समय बर्बाद करने के बजाय रूस-यूक्रेन युद्ध और अपने देश की आंतरिक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।
पेंटागन की घोषणा और कड़ा कूटनीतिक संदेश
जर्मन नेतृत्व के साथ हुई इस तीखी बहस के बाद पेंटागन ने सैनिकों की संख्या में कटौती का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों का मानना है कि जर्मनी की बयानबाजी ‘अनुचित’ थी और सैनिकों की वापसी इसका एक सही जवाब है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय केवल सैन्य कटौती नहीं है, बल्कि नाटो देशों के लिए एक सख्त कूटनीतिक चेतावनी भी है कि अमेरिका अब बिना शर्त सैन्य समर्थन देने के मूड में नहीं है।
वापसी की समयसीमा और सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव
पेंटागन के अनुसार, सैनिकों की वापसी की यह प्रक्रिया अगले 6 से 12 महीनों के भीतर पूरी कर ली जाएगी। इस कटौती के बाद यूरोप में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति उसी स्तर पर पहुंच जाएगी, जो 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले थी। तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडन ने यूक्रेन पर हमले के बाद सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए सैनिकों की संख्या बढ़ाई थी, लेकिन अब ट्रंप प्रशासन उन फैसलों को पलट रहा है, जिससे पूरे यूरोप में सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
जर्मनी: यूरोप में अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण सैन्य केंद्र
जर्मनी वर्तमान में यूरोप में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य आधार है। यहां लगभग 35,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं और यह क्षेत्र एक प्रमुख ट्रेनिंग हब के रूप में कार्य करता है। जर्मनी नाटो का एक स्तंभ माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ महीनों से यह लगातार ट्रंप के निशाने पर है। ट्रंप ने विशेष रूप से ईरान युद्ध के दौरान ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को खुला रखने के लिए अपनी नौसेना न भेजने पर यूरोपीय देशों की कड़ी निंदा की थी।
नाटो के भविष्य और वैश्विक राजनीति पर असर
अमेरिका के इस कदम ने नाटो की एकजुटता पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। ट्रंप प्रशासन का यह रुख स्पष्ट करता है कि वह ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर अडिग है और सहयोगियों से अधिक जिम्मेदारी की अपेक्षा करता है। यदि जर्मनी और अमेरिका के बीच यह गतिरोध बना रहता है, तो आने वाले समय में यूरोप की रक्षा आत्मनिर्भरता और नाटो के अस्तित्व को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। वैश्विक राजनीति के जानकार इसे पावर स्ट्रक्चर में एक बड़े बदलाव के रूप में देख रहे हैं।
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