UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर महापुरुषों के स्मारकों को लेकर बहस छिड़ गई है। दिलचस्प बात यह है कि कभी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की ‘स्मारक संस्कृति’ और मूर्तियों पर होने वाले खर्च की तीखी आलोचना करने वाली भारतीय जनता पार्टी, अब खुद उसी राह पर चलती दिखाई दे रही है। लखनऊ के ऐशबाग में डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर बन रहा भव्य मेमोरियल और कल्चरल सेंटर इस समय चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
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विपक्ष की तर्ज पर भाजपा का बड़ा दांव
करीब दो दशक पहले मायावती ने लखनऊ में विशाल अंबेडकर स्मारक बनवाकर दलित राजनीति को एक नई दिशा दी थी। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार लखनऊ के ऐशबाग में 5,493.52 वर्ग मीटर में एक नया ‘भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मारक और सांस्कृतिक केंद्र’ तैयार करवा रही है। 2022 में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा रखी गई इस स्मारक की नींव का बजट शुरुआती दौर में 45 करोड़ रुपये था, जो विस्तार के बाद अब 100 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। भाजपा के इस कदम ने समर्थकों को हैरान कर दिया है, क्योंकि पार्टी ने कभी मायावती के ऐसे ही खर्चों को ‘जनता के पैसे की बर्बादी’ बताया था।
बसपा के मॉडल से कितना अलग?
भाजपा का यह स्मारक केवल एक मूर्ति तक सीमित नहीं है। इसमें बाबा साहेब की 25 फीट ऊंची प्रतिमा के साथ-साथ एक आधुनिक ऑडिटोरियम, लाइब्रेरी, रिसर्च सेंटर और शोधकर्ताओं के लिए विशेष सुविधाएं होंगी। सरकार का लक्ष्य इसे केवल एक दर्शनीय स्थल नहीं, बल्कि अंबेडकर के विचारों पर शोध करने वाले छात्रों के लिए एक बड़े केंद्र के रूप में विकसित करना है। योजना के अनुसार, जुलाई 2027 तक, यानी अगले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, इसका उद्घाटन कर दिया जाएगा।
2024 की हार और ‘दलित वोट बैंक’ की चिंता
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा का यह हृदय परिवर्तन 2024 के लोकसभा चुनावों में मिले झटके का परिणाम है। 2014 के बाद से जो दलित वोटर बसपा को छोड़कर भाजपा के पाले में आए थे, उनमें से एक बड़ा हिस्सा 2024 में सपा और कांग्रेस के ‘संविधान बचाओ’ नारे की ओर शिफ्ट हो गया। संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के विपक्षी प्रचार ने भाजपा को यूपी में दूसरे नंबर की पार्टी बना दिया, जबकि समाजवादी पार्टी 36 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
दलितों को साधने की कोशिश
भाजपा अब 2027 के विधानसभा चुनाव में 2024 वाली गलती दोहराने के मूड में नहीं है। पार्टी को अहसास है कि बिना दलितों (विशेषकर जाटव वोट बैंक) के समर्थन के सत्ता में वापसी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। इस स्मारक के जरिए भाजपा खुद को ‘असली दलित हितैषी’ साबित करना चाहती है। यह संदेश देने की कोशिश है कि भाजपा न केवल बाबा साहेब का सम्मान करती है, बल्कि उनके विचारों को सहेजने के लिए करोड़ों रुपये भी खर्च कर रही है।










