UP News: मोहन भागवत के बयान से गरमाई सियासत, मायावती ने आरक्षण पर दिया जवाब

बसपा प्रमुख और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने आरएसएस (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर पलटवार करते हुए संघ से अपील की है

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Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

अगस्त 9, 2026

UP News: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण को लेकर दिए गए हालिया बयान पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। मायावती ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि देश के बहुजन समाज—विशेषकर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)—के लिए आरक्षण केवल सरकारी नौकरी या लाभ का साधन नहीं, बल्कि उनके सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक मुक्ति और आत्म-सम्मान का सबसे बड़ा आधार है। आइए जानते हैं इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम और मायावती के बयानों के मुख्य बिंदुओं के बारे में विस्तार से।

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“आरक्षण में क्रीमी लेयर और छेड़छाड़ संविधान की भावना के खिलाफ”

बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने तीखे बयानों में इस बात पर जोर दिया कि सदियों से जातिगत भेदभाव, अमानवीय शोषण और अत्याचार का सामना करने वाले एससी और एसटी वर्गों के लिए आरक्षण बेहद जरूरी और जीवनरेखा के समान है।

क्रीमी लेयर पर आपत्ति: उन्होंने आरक्षण के दायरे में ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने की चर्चाओं को पूरी तरह से अनुचित करार दिया। मायावती का कहना है कि यह विचार बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के मानवतावादी और कल्याणकारी संविधान के पवित्र उद्देश्यों के बिल्कुल विपरीत है।

राजनीति बंद करने की अपील: मायावती ने आरएसएस (RSS) को आड़े हाथों लेते हुए नसीहत दी कि उसे आरक्षण के संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति बिल्कुल बंद कर देनी चाहिए। उन्होंने संघ से अपील की कि वह आरक्षण में किसी भी तरह की छेड़छाड़ या बदलाव की वकालत करने से बचे।

“आरक्षण को केवल आर्थिक नजरिए से नहीं देखा जा सकता”

संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान पर निशाना साधते हुए, जिसमें उन्होंने कहा था कि आरक्षण का राजनीतिकरण किया गया है जिससे समाज में कड़वाहट पैदा होती है और सक्षम लोगों को स्वेच्छा से इसका लाभ छोड़ देना चाहिए, मायावती ने इसे संकीर्ण मानसिकता बताया।

जातिवाद का दंश: मायावती ने स्पष्ट किया कि आरक्षण को केवल आर्थिक उन्नति या गरीबी हटाने का पैमाना नहीं माना जा सकता। जातिवाद और छुआछूत का दंश समाज के इन वर्गों के लोगों के जीवन को हर स्तर पर प्रभावित करता है और आज भी यह सामाजिक वास्तविकता बदस्तूर जारी है।

संवैधानिक उद्देश्य: उन्होंने कहा कि समतामूलक समाज की स्थापना करना हमारे संविधान का मूल दायित्व है। ऐसे में, आरक्षण उन करोड़ों शोषित, पीड़ित, उपेक्षित और तिरस्कृत लोगों को समानता का अधिकार देने का एकमात्र संवैधानिक माध्यम है।

सरकारों की लचर कानूनी पैरवी पर भी उठाए सवाल

इस पूरे बयान के दौरान मायावती ने केंद्र सरकारों की कार्यप्रणाली और अदालतों में उनके पक्ष रखने के तरीके पर भी गंभीर सवाल खड़े किए।

जमीनी हकीकत से परिचित हैं सरकारें: उन्होंने कहा कि देश में सत्ता में रही सभी सरकारें देश की जमीनी सामाजिक वास्तविकताओं से भली-भांति परिचित हैं।

मजबूत पैरवी की मांग: मायावती ने कहा कि यदि केंद्र सरकार उचित तर्कों के साथ, प्रभावी और मजबूत कानूनी पैरवी करते हुए अदालत को यह समझाने में सफल रहती है कि एससी और एसटी समाज को ‘क्रीमी लेयर’ के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए, तो यह संवैधानिक रूप से पूरी तरह उचित कदम होगा।

न्याय में कमी: उन्होंने आरोप लगाया कि अक्सर सरकारों की कमजोर और लचर पैरवी के कारण अदालतें सामाजिक परिवर्तन से जुड़े मामलों में अपेक्षित न्याय नहीं दे पाती हैं। मायावती के इस आक्रामक रुख से साफ है कि देश में आरक्षण और सामाजिक न्याय का यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहसों के केंद्र में आ गया है।

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