UP News: उत्तर प्रदेश सूचना आयोग ने हाल ही में एक अहम निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि आरटीआई कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की निजी जानकारी हासिल करने के लिए नहीं किया जा सकता, भले ही वह व्यक्ति आवेदक का ससुर ही क्यों न हो। इस फैसले से साफ संकेत मिला है कि निजता के अधिकार को आरटीआई के नाम पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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आरटीआई की सीमा तय करता आयोग का फैसला
सूचना आयुक्त मोहम्मद नदीम ने इस मामले की सुनवाई के बाद कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम निजी मुकदमों में सबूत जुटाने का साधन नहीं है। आयोग ने यह भी दोहराया कि यह कानून किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत जिंदगी में बिना ठोस वजह के दखल देने की अनुमति नहीं देता। आयोग का मानना है कि वेतन, संपत्ति, भविष्य निधि और कर्ज जैसी जानकारियां किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत सूचना होती हैं, जिन्हें सार्वजनिक करना आरटीआई के दायरे में नहीं आता।
क्या था पूरा मामला?
इस मामले में एक व्यक्ति कुलवंत सिंह ने अपनी पत्नी द्वारा लगाए गए 26 लाख रुपये दहेज के आरोप के बाद आरटीआई का सहारा लिया। उन्होंने अपने ससुर, जो बिजनौर जिले के नजीबाबाद तहसील में राजस्व निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे, उनकी वेतन संबंधी जानकारी, जीपीएफ, लोन, एडवांस और चल-अचल संपत्ति का विवरण मांगा। आवेदक का तर्क था कि दहेज के आरोपों से जुड़े मुकदमे में यह जानना जरूरी है कि क्या उनके ससुर की आर्थिक स्थिति इतनी सक्षम थी कि वे इतना दहेज दे सकते थे या नहीं।
सूचना न मिलने पर आयोग में पहुंचा मामला
जब आरटीआई आवेदन के बावजूद मांगी गई जानकारी नहीं दी गई, तो आवेदक ने राज्य सूचना आयोग में अपील दायर की। उन्होंने जनसूचना अधिकारी को निर्देश देने की मांग की कि उन्हें सभी आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध कराई जाएं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
सूचना आयुक्त की पीठ ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया। इनमें स्पष्ट किया गया है कि वेतन विवरण, आयकर रिटर्न, भविष्य निधि, कर्ज और पारिवारिक संपत्ति जैसी जानकारियां पूरी तरह से निजी सूचना की श्रेणी में आती हैं, जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में आरटीआई के तहत साझा नहीं किया जा सकता। आयोग ने यह भी कहा कि दामाद होना या किसी केस में इन सूचनाओं की जरूरत बताना ‘बड़ा जनहित’ नहीं माना जा सकता।
आयोग की दो टूक: सही मंच है अदालत
अपने फैसले में पीठ ने साफ कहा कि यदि आवेदक को अपने बचाव के लिए इस तरह की जानकारी जरूरी लगती है, तो इसके लिए उचित मंच न्यायालय है, न कि आरटीआई। आयोग ने स्पष्ट किया कि आवेदक अपने मुकदमे के दौरान अदालत से अनुरोध कर सकता है कि वह संबंधित विभाग से आवश्यक दस्तावेज तलब करे। यदि न्यायालय को यह जानकारी जरूरी लगेगी, तो वह स्वयं विभाग को आदेश देकर इसे मंगवा सकता है।
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निजता बनाम सूचना का अधिकार
इस फैसले के जरिए उत्तर प्रदेश सूचना आयोग ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आरटीआई का उद्देश्य पारदर्शिता है, न कि निजी जीवन में हस्तक्षेप। यह निर्णय आने वाले समय में आरटीआई के दुरुपयोग पर एक अहम नजीर के तौर पर देखा जाएगा।










