UP Leaders: मौजूदा दौर में राजनीति को धनबल और बाहुबल का खेल माना जाता है। अपने सियासी रसूख को नुमायां करने के लिए गाडियों के काफिलों और समर्थकों के हजूम को राजनीति की जरूरी शर्त मान लिया गया है। आलीशान कोठियों और लग्जरी गाड़ियों की चकाचौंध तथा लिनिन के कुर्ते से लकदक माननीयों के बीच कुछ ऐसे भी जनप्रतिनिधि रहे है जिन्होंने तमाम अभावों के बावजूद पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ जनता की सेवा की। आइये आपको बताते है यूपी विधानसभा के पांच ऐसे माननीयों के बारे में जिनकी सादगी, सरलता व ईमानदारी का लोहा उनके विरोधी भी मानते थे.
झोपड़ी में रहकर जनता की सेवा करते रहे बंशीधर बौद्ध

बहराइच की बलहा विधानसभा सीट से सपा के टिकट पर जीते बंशीधर बौद्ध का पूरा जीवन सादगी की मिसाल रहा। अखिलेश सरकार में राज्यमंत्री बनाये जाने के बाद भी बंशीधर बौद्ध ने अपना खेती का काम नहीं छोड़ा। वह लगातार अपनी दैनिक दिनचर्या में व्यस्त रहते थे। उन्होंने खेतीबाडी के लिए कोई सहायक नहीं रखा था और मवेशियों का गोबर भी वह स्वयं ही साफ करते थे। जब उन्हे मंत्री बनाया गया तो उनके पास न तो अपनी कोई गाड़ी थी और न ही कोई घर। वह अपने परिवार के साथ झोंपडी में बसर करते थे।
स्कूटर और रोडवेज बस से सफर करते थे आलमबदी

आजमगढ़ की निजामाबाद सीट से पांच बार के सपा विधायक रहे आलमबदी भी सादगी की मिसाल रहे। उनकी सादगी का आलम यह था कि सपा के मंचों से ही उन्हे धकिया दिया जाता था। आलमबदी स्वयं क्षेत्र की पान व चाय की दुकानों पर जाकर लोगों की समस्याओं को सुनते थे। वह रोड़वेज की बस से ही सफर करते थे। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उनकी ईमानदारी और सादगी के कायल थे। आलमबदी ने कभी भी अपने टिकट की पैरवी नहीं की। हर बार सपा प्रत्याशियों की पहली सूची में उनका नाम होता था। चुनाव की घोषणा होते ही वह प्रचार में जुट जाते थे, क्षेत्र की जनता का उन्हे व्यापक समर्थन था। पांच बार विधायक रहने के बाद भी उन्हे गाडियों के काफिलों का कोई शौक नहीं था। वह स्कूटर की पिछली सीट पर बैठकर ही विधानसभा पहुंच जाते थे।
सात बार विधायक, एक बार मंत्री, फिर भी हवाई चप्पल में घूमते थे ‘दादा’

इसी तरह यूपी विधानसभा के एक और वरिष्ठ सदस्य हुआ करते थे श्यामदेव राय चौधरी। 1989 में भाजपा के टिकट पर वाराणसी दक्षिण विधानसभा सीट से चुनाव जीते श्यामदेव राय चौधरी को लोग सम्मान से दादा कहते थे। 7 बार विधायक और एक बार मंत्री रहने के बाद भी वह हवाई चप्पल में किसी की भी मोटरसाइकिल या स्कूटर पर बैठ कर क्षेत्र में निकल जाते थे। वोट या जाति से परे हट कर वह उनके पास आने वाले हर किसी की समस्या को सुनते थे। विधानसभा सत्र के दौरान वह पैदल ही दारूलशफा स्थित अपने आवास जाते थे। उनकी ईमानदारी के विपक्षी भी कायल थे। एक बार बिजली कटौती को लेकर वह धरने पर बैठे तो तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हे विशेष तौर पर आमंत्रित कर मुलाकात की।
नौ बार विधायक रहे ऊदल ने नहीं ली पेंशन

वाराणसी की कोलअसला विधानसभा सीट से नौ बार विधायक रहे ऊदल ने 1996 में चुनाव हारने के बाद कोई चुनाव नहीं लड़ा। वह सभी के लिए सुलभ रहते थे। नौ बार विधायक रहने के बाद भी उन्होंने कभी पेंशन नहीं ली। एक बार जब वह बीमार हुए तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उन्हे कुछ राशि उपचार की सहायता के लिए भेजी लेकिन ऊदल ने लेने से इंकार कर दिया और अपने ही धन से उपचार कराया।
विधायक रहते भी चलानी पड़ी चाय-पान की दुकान

श्रावस्ती जिले की इकौना विधानसभा सीट से जनसंघ के बैनर पर दो बार विधायक बने भगवती प्रसाद भी यूपी के सियासी इतिहास में ईमानदारी व सादगी की मिसाल बने। उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। विधायक होने के बावजूद जीवकोपार्जन के लिए उन्हे चाय व पान की दुकान खोलनी पड़ी थी।










