UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में चुनावी बिसात सज चुकी है। राजनीतिक दलों ने अपने तीर-तरकश तराशने शुरू कर दिए है। चुनावी लिहाज से नफा नुकसान का आकलन करते हुए तमाम जातीय गोलबंदी की शुरूआत हो गई है। चुनावी दांवपेंच भी आजमाने शुरू किए जा चुके है। चुनाव की बात हो और ब्राहम्ण वोटों की बात न हो ऐसा कैसे हो सकता है। रैलियों के मंच से सड़कों तक और सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर चर्चा गरम है कि ब्राहम्ण किस दल के पाले में खड़ा होगा।
10 से 12 प्रतिशत की आबादी और ब्राह्मण वोटों का व्यापक प्रभाव

यूपी में ब्राहम्ण वर्ग का वोट भले ही 10 से 12 प्रतिशत तक सीमित हो लेकिन इसका प्रभाव बहुत ही व्यापक है। ऐसा माना जाता है कि ब्राहम्ण समाज लामबंद हो जाए तो किसी भी दल के पक्ष में या खिलाफ माहौल बना देता है। यही वजह है कि आज भाजपा, सपा और बसपा जैसे तमाम प्रमुख दल इस समाज को साधने के लिए नए-नए समीकरण और रणनीति गढ़ रहे हैं।
समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले में पंडितों को जोड़ने की रणनीति
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय ब्राह्मण मतों को लेकर एक अजीब सी होड़ देखने को मिल रही है। जो समाजवादी पार्टी अब तक अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के नारे को अपनी चुनावी रणनीति की धुरी मानकर चल रही थी, उसने अचानक अपनी कार्यशैली में बड़ा बदलाव किया है। सपा नेतृत्व अब पीडीए के दायरे को विस्तार देते हुए इसमें पंडित को भी जोड़ने की पुरजोर कोशिश कर रहा है।
बसपा का सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला और भाजपा की चुनावी पकड़

दूसरी तरफ, बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती भी इस रेस में पीछे नहीं रहना चाहतीं। अतीत के सोशल इंजीनियरिंग के सफल फॉर्मूले को ध्यान में रखते हुए वे खुलकर ब्राह्मण समाज को अपनी पार्टी के साथ आने का न्योता दे रही हैं। इधर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अपनी सरकार और संगठन दोनों में ही प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरों को आगे रखकर इस बड़े जनाधार को अपने पाले में मजबूत बनाए रखने के अथक प्रयास में जुटी है। सवाल यह उठता है कि आखिर सभी दलों के लिए यह वर्ग इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है?
सीमित आबादी के बावजूद ब्राह्मण समाज की असली ताकत
ऐसा माना जाता है कि प्रदेश की आबादी में ब्राह्मण समाज की हिस्सेदारी करीब 10 से 12 प्रतिशत के आसपास बैठती है। आंकड़ों के लिहाज से यह संख्या अन्य पिछड़े वर्गों या दलित समुदाय के मुकाबले बहुत अधिक नजर नहीं आती, लेकिन इनकी असली ताकत इनके सीधे आंकड़ों में नहीं बल्कि इनके सामाजिक प्रभाव में छिपी हुई है।
चौपालों से लेकर चाय अड्डों तक—ओपिनियन मेकर की भूमिका
गांवों की चौपालों से लेकर शहरों के चाय-पान के अड्डों तक, यह समाज राय बनाने और माहौल तैयार करने में बेहद अहम भूमिका निभाता है। इनका वैचारिक रुख अक्सर आसपास के अन्य मतदाताओं की सोच को भी प्रभावित करता है। इसी बौद्धिक और सामाजिक सक्रियता के कारण राजनीतिक विश्लेषक इन्हें केवल एक वोट बैंक नहीं, बल्कि ओपिनियन मेकर यानी राय बनाने वाला वर्ग मानते हैं।
पूर्वांचल से बुंदेलखंड तक ब्राह्मण समाज का व्यवस्थित फैलाव
ब्राह्मण समाज की एक बड़ी खासियत यह है कि यह किसी एक जिले या हिस्से तक सीमित नहीं है। पूर्वांचल की तराई से लेकर अवध के मैदानी इलाकों, मध्य यूपी की शहरी बेल्ट और बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों तक इनका व्यवस्थित फैलाव है।
आंकड़ों और चुनावी सर्वे के अनुमानों पर नजर डालें तो प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से लगभग 212 सीटें ऐसी हैं जहां इस समाज की आबादी 10 फीसदी से कम है। वहीं, करीब 149 सीटें ऐसी हैं जहां इनकी मौजूदगी 10 से 20 प्रतिशत के बीच दर्ज की जाती है। इसके अलावा 42 सीटें ऐसी हैं जहां यह आबादी 20 फीसदी से भी अधिक है। लगभग 97 विधानसभा क्षेत्र ऐसे चिन्हित किए गए हैं, जहां 15 फीसदी से ज्यादा की मौजूदगी इन्हें हर चुनाव में सीधे तौर पर एक मजबूत ताकत के रूप में स्थापित करती है।
यूपी की 403 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण आबादी का गणित

यूपी में ब्राहम्णों के इस वर्चस्व को समझने के लिए इनकी इसी गणित को समझना होगा। पूर्वांचल और अवध के जिलों जैसे प्रयागराज, प्रतापगढ़, अमेठी, सुल्तानपुर, गोंडा, देवरिया, बस्ती और अयोध्या की कई सीटें ऐसी है जहां ब्राहम्ण निर्णायक फैक्टर है। प्रयागराज की मेजा, करछना, फाफामऊ, फूलपुर और शहर की सीटें हों या प्रतापगढ़ का रामपुर खास और पट्टी इलाका, इन जगहों पर यह वोट बैंक जिस ओर झुकता है, विजयश्री का सेहरा उसी पार्टी के सिर सजता है। इसके अलावा कानपुर नगर के कल्याणपुर और बिठूर जैसे शहरी इलाके भी इसी निर्णायक श्रेणी का हिस्सा हैं। जहां ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या और उनकी राजनीतिक सक्रियता किसी भी उम्मीदवार की जीत या हार का फैसला करती है।
प्रयागराज, प्रतापगढ़ और अयोध्या में ब्राह्मणों का निर्णायक असर
जैसे-जैसे हम मध्य यूपी, कानपुर देहात, फर्रूखाबाद और बुंदेलखंड के इलाकों की तरफ बढ़ते हैं, वहां मिलाजुला प्रभाव देखने को मिलता है। जालौन के माधौगढ़ और कालपी, झांसी नगर और बांदा जैसे जिलों में यह समाज अन्य जातियों के साथ मिलकर एक मजबूत गठजोड़ तैयार करता है। इन क्षेत्रों में अक्सर देखा गया है कि मुकाबला जब बेहद कड़ा या त्रिकोणीय होता है। ऐसे में ब्राहम्ण स्विंग फैक्टर बनकर उभरता है। यानी यदि दो प्रमुख प्रत्याशी अपने-अपने जातीय आधार पर बराबर की टक्कर में खड़े हों, तो इस समुदाय का एकमुश्त वोट जिस पाले में गिरता है, वही उम्मीदवार बाजी मार ले जाता है।
कड़े और त्रिकोणीय मुकाबलों में ‘स्विंग फैक्टर’ की भूमिका
हालांकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों जैसे सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत और बुलंदशहर में ब्राहम्ण समाज का इतना असर नहीं हैं। इन जिलों में चुनावी गणित जाट, गुर्जर, जाटव, मुस्लिम जैसे जातीय समीकरणों के आसपास घूमती है। हालांकि पश्चिम उत्तर प्रदेश में भी नोएडा, साहिबाबाद और गाजियाबाद जैसे शहरी क्षेत्रों में ब्राह्मण और अन्य सवर्ण मतदाताओं की अच्छी आबादी है। यहां यह मिलकर उलटफेर करने की स्थिति में रहते
2007 से 2017 तक की सरकारों के गठन में ब्राह्मण समर्थन की भूमिका
उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में ब्राहम्ण हमेशा से केंद्र बिंदु रहा है। वर्ष 2007 में मायावती की पूर्ण बहुमत की सरकार बनानी हो या 2017 में भाजपा को सत्ता के तख्त तक पहुंचाना हो। इस वर्ग का समर्थन हमेशा जरूरी रहा है। अब देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में विकास के दावों, वादों और सामाजिक समीकरणों के इस महाजाल के बीच यह निर्णायक वर्ग किसके पक्ष में अपना अंतिम जनादेश देता है।










