UN General Assembly : संयुक्त राष्ट्र ने बाल विवाह के खिलाफ चल रहे वैश्विक अभियान को एक मजबूत और नई संस्थागत ताकत दी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर 2026 को प्रस्ताव A/80/L.99 को सर्वसम्मति से पारित किया है। इसके तहत अब हर साल 27 नवंबर को बाल, कम उम्र और जबरन विवाह के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का बड़ा निर्णय लिया गया है। इस महत्वपूर्ण पहल को सिएरा लियोन द्वारा आगे बढ़ाया गया था, जिसे भारत समेत दुनिया के कई देशों का पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ।
बच्चों के अधिकारों पर बढ़ेगा वैश्विक ध्यान
संयुक्त राष्ट्र के इस बड़े निर्णय का मुख्य उद्देश्य केवल एक तारीख तय करना नहीं है, बल्कि इसके जरिए दुनिया भर के देशों को बच्चों, और विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा उनके उज्ज्वल भविष्य से जुड़े अधिकारों को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करना है। यह वैश्विक पहल सतत विकास लक्ष्यों के अंतर्गत बाल विवाह जैसी कुप्रथा को जड़ से खत्म करने के वास्ते सरकारी नीतियों और जमीनी स्तर पर चल रहे कार्यों को एक नई गति प्रदान करेगी।
भारत के लिए बेहद खास है 27 नवंबर
भारत देश के लिए 27 नवंबर की तारीख का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। इसी विशेष तारीख को वर्ष 2024 के दौरान केंद्र सरकार ने देश में ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ नामक राष्ट्रीय अभियान का शुभारंभ किया था। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के इस बहुउद्देशीय अभियान का मुख्य लक्ष्य देश भर से बाल विवाह की रोकथाम के लिए सरकार, प्रशासनिक तंत्र, स्थानीय समुदायों और जागरूक नागरिक समाज को एक साझा मंच पर लाना है।
सामुदायिक भागीदारी पर दिया जा रहा जोर
‘बाल विवाह मुक्त भारत’ अभियान को केवल कागजी या कानूनी कार्रवाई तक ही सीमित नहीं रखा गया है। इसके तहत बाल विवाह से जुड़ी सूचनाओं का समय पर आदान-प्रदान करने, बाल विवाह निषेध अधिकारियों की जवाबदेही मजबूत करने और अधिक जोखिम वाले संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान पर खास जोर दिया जा रहा है। किशोरियों को उच्च शिक्षा और कौशल विकास से जोड़ना भी इस अभियान का एक बेहद अहम हिस्सा है ताकि समाज की सोच में सकारात्मक बदलाव लाया जा सके।
आंकड़ों में आई है कुछ गिरावट
भारत में पिछले दो दशकों के दौरान बाल विवाह की दर में उल्लेखनीय कमी जरूर दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद यह चुनौती आज भी समाज के सामने एक गंभीर समस्या बनी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019-21 के दौरान 20 से 24 वर्ष की आयु वर्ग की करीब 23.3 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले ही कर दिया गया था।
हर पांच में से एक महिला प्रभावित
नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 के 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार यह अनुपात घटकर अब 20.1 प्रतिशत पर आ गया है। हालांकि यह नए आंकड़े स्थिति में सुधार का एक स्पष्ट संकेत देते हैं, लेकिन मौजूदा यथार्थ यह बताता है कि यह समस्या अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। यह 20.1% का आंकड़ा यह दर्शाता है कि आज भी लगभग हर पांच में से एक युवा महिला बाल विवाह का शिकार बन रही है।
2030 तक का तय किया गया लक्ष्य
केंद्र सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, वर्ष 2026 तक बाल विवाह की मौजूदा दर में लगभग 10 प्रतिशत तक की कमी लाने का स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके साथ ही, वर्ष 2030 तक पूरे भारत को पूरी तरह से बाल-विवाह मुक्त बनाने का बड़ा संकल्प लिया गया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार को राज्यों के साथ मिलकर और भी अधिक केंद्रित प्रयास करने होंगे।
शिक्षा और सख्त कानून की जरूरत
बाल विवाह जैसी कुप्रथा के पीछे मुख्य रूप से गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक दबाव, गहरी लैंगिक असमानता और कठिन पारिवारिक परिस्थितियां जिम्मेदार होती हैं। कम उम्र में शादी हो जाने से लड़कियों की शिक्षा बीच में ही छूट जाती है, जिससे उनके स्वास्थ्य और आर्थिक स्वतंत्रता पर बुरा असर पड़ता है। इसलिए कानूनी सख्ती के साथ-साथ बेटियों की शिक्षा और परिवारों की आर्थिक मदद जरूरी है।
भारत को मिलेगा एक वैश्विक मंच
27 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय दिवस की आधिकारिक मान्यता मिलने से बाल विवाह के खिलाफ भारत द्वारा चलाए जा रहे अभियानों को एक वैश्विक मंच मिल जाएगा। देश अब अपनी सफलताओं और प्रगति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा कर सकता है तथा उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित कर सकता है जहां बाल विवाह की दर अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक बनी हुई है।
मंजिल अभी दूर, जारी रहेगी मुहिम
संयुक्त राष्ट्र का यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन असली सफलता जमीनी स्तर पर होने वाले वास्तविक बदलाव से ही तय होगी। भारत में दर 23.3% से घटकर 20.1% होना एक सकारात्मक संकेत है, फिर भी मंजिल पाने के लिए लंबा सफर तय करना बाकी है। 27 नवंबर का यह दिन हमेशा हमें यह याद दिलाएगा कि हर बच्चे का सुरक्षित बचपन और बेहतर भविष्य उसका मौलिक अधिकार है।