Udhayanidhi Stalin : ‘मैं मंदिरों का विरोधी नहीं हूं’, उदयनिधि स्टालिन ने बताया सनातन पर असली रुख

सनातन धर्म को लेकर दिए गए विवादित बयान पर घिरे तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने अब एक नई सफाई पेश की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका विरोध आस्था या मंदिरों से नहीं, बल्कि सामाजिक बुराइयों से है। क्या यह बयान उनकी पुरानी छवि सुधारने की कोशिश है? पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ें।

Udhayanidhi Stalin

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मई 15, 2026

Udhayanidhi Stalin :  तमिलनाडु के पूर्व डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन ने ‘सनातन’ के उन्मूलन को लेकर दिए गए अपने हालिया विवादास्पद बयान पर दो दिनों की चुप्पी के बाद स्पष्टीकरण जारी किया है। उदयनिधि ने तर्क दिया कि उनके शब्दों का गलत अर्थ निकाला जा रहा है और वे किसी भी व्यक्ति की धार्मिक आस्था या मंदिर जाने की स्वतंत्रता के विरुद्ध नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका वास्तविक विरोध उस रूढ़िवादी सोच और सामाजिक व्यवस्था से है, जो जाति के आधार पर मनुष्यों के बीच भेदभाव पैदा करती है। उदयनिधि के अनुसार, जब तक समाज में ऊंच-नीच की भावना बनी रहेगी, तब तक सामाजिक न्याय की कल्पना अधूरी है।

विधानसभा में दिया था विवादित बयान: सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी जारी है तेवर

उदयनिधि स्टालिन ने 12 मई को विधानसभा के पटल पर खड़े होकर एक बार फिर सनातन धर्म को लेकर तीखी टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि सनातन धर्म को पूरी तरह खत्म कर दिया जाना चाहिए क्योंकि यह समाज को विभिन्न वर्गों में विभाजित करता है। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने ऐसी भाषा का प्रयोग किया है; इससे पहले 2023 में भी उन्होंने सनातन की तुलना डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों से की थी। इस बयानबाजी के कारण मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कड़ी फटकार लगाते हुए उनके पद की गरिमा और बयान के परिणामों के प्रति सचेत किया था, फिर भी उदयनिधि ने अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया है।

सोशल मीडिया पर दी वैचारिक चुनौती: आलोचनाओं से न डरने का संकल्प

अपनी बात को जनता तक पहुँचाने के लिए उदयनिधि ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ का सहारा लिया। उन्होंने लिखा कि विधानसभा में उनके बयान के बाद हो रही आलोचनाएं उन्हें विचलित नहीं कर सकतीं। उन्होंने द्रविड़ आंदोलन के इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि यह विचारधारा हमेशा संघर्षों और विरोधों के बीच ही फली-फूली है। उदयनिधि ने एक “छोटी-सी बात” साफ करते हुए कहा कि उनके बयान का आशय यह कतई नहीं है कि लोग ईश्वर की पूजा करना छोड़ दें, बल्कि उनका लक्ष्य उस “मानसिकता का अंत” करना है जो समाज को ऊंची और नीची जातियों के क्रूर विभाजन में बांटती है।

पेरियार और अंबेडकर के विचारों का हवाला: समानता के अधिकार पर जोर

डिप्टी सीएम ने अपनी विचारधारा को द्रविड़ आंदोलन के दिग्गजों—पेरियार, डॉ. बी.आर. अंबेडकर, अन्नादुरई और करुणानिधि—के सिद्धांतों से जोड़ा। उन्होंने कहा कि उनका विरोध किसी भगवान या आस्था से नहीं, बल्कि उस असमानता और उत्पीड़न से है जो धर्म की आड़ में किया जाता है। उन्होंने महान संत तिरुवल्लुवर के वचनों को उद्धृत करते हुए कहा कि “सभी जीव जन्म से समान हैं” और यही उनकी पार्टी और सरकार का मूल मार्ग है। उन्होंने दावा किया कि सनातन प्रथा के कड़े विरोध के कारण ही समाज में सती जैसी कुरीतियां खत्म हुईं और महिलाओं को घर से बाहर निकलकर प्रगति करने का अवसर मिला।

मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी: ‘हेट स्पीच’ के दायरे में आया स्टालिन का बयान

एक तरफ जहाँ उदयनिधि इसे वैचारिक विरोध बता रहे हैं, वहीं कानूनी मोर्चे पर उनकी मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में उनके तीन साल पुराने बयान पर सुनवाई करते हुए सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि “सनातन ओझिप्पु” (सनातन का विनाश) जैसे शब्दों का प्रयोग केवल वैचारिक विरोध नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाता है जो इस धर्म को मानते हैं। उच्च न्यायालय ने इसे ‘हेट स्पीच’ की श्रेणी में रखते हुए कहा कि ऐसे शब्द सांस्कृतिक नरसंहार का संकेत देते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को शब्दों का चयन अत्यंत सावधानी से करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: अधिकारों के दुरुपयोग पर लगाई गई थी लगाम

उदयनिधि स्टालिन को न्यायिक स्तर पर पहले भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। 4 मार्च 2025 को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह कहकर फटकारा था कि उन्होंने अपने बोलने की आजादी और संवैधानिक अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया है। शीर्ष अदालत ने उन्हें याद दिलाया था कि वे कोई आम नागरिक नहीं बल्कि एक प्रभावशाली नेता और सरकार का हिस्सा हैं, इसलिए उनके द्वारा दिए गए बयानों के गहरे सामाजिक परिणाम हो सकते हैं। अदालत की इस सख्त टिप्पणी के बावजूद, उदयनिधि का ताजा बयान यह दर्शाता है कि तमिलनाडु की राजनीति में सनातन धर्म और द्रविड़ विचारधारा का यह द्वंद्व अभी और लंबा खिंचने वाला है।

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