Trump Greenland Claim: आर्कटिक में नया तनाव, ट्रंप का ग्रीनलैंड पर कब्जे का दावा, डेनमार्क ने भारत से मांगी मदद

ट्रंप का मिशन ग्रीनलैंड: क्या दुनिया देखेगी एक नया सैन्य संघर्ष या कूटनीति बचाएगी डेनमार्क का हिस्सा? वेनेजुएला में तख्तापलट के बाद अब डोनाल्ड ट्रंप की नजरें बर्फ से ढके रणनीतिक द्वीप ग्रीनलैंड पर हैं। ट्रंप ने इसे 'जरूरी' बताते हुए बल प्रयोग के संकेत दिए हैं, जिससे सहमे डेनमार्क ने सीधे भारत का दरवाजा खटखटाया है। क्या मोदी सरकार इस वैश्विक संकट में मध्यस्थ बनेगी?

Trump Greenland

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 10, 2026

Trump Greenland Claim: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए हालिया बयानों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में खलबली मचा दी है। आर्कटिक क्षेत्र में स्थित यह विशाल द्वीप रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है और वर्तमान में डेनमार्क का एक अर्ध-स्वायत्त (Semi-autonomous) क्षेत्र है। ट्रंप ने 2019 में भी इस द्वीप को खरीदने की इच्छा जताई थी, जिसे डेनमार्क ने सिरे से खारिज कर दिया था। अब 2026 में, ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड पर अपना दबाव बढ़ा दिया है। उनका तर्क है कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इस द्वीप पर नियंत्रण आवश्यक है। ट्रंप की इस आक्रामक मुद्रा ने न केवल डेनमार्क बल्कि पूरे यूरोपीय संघ को चिंता में डाल दिया है।

“सहयोग या सैन्य बल”: डेनमार्क को ट्रंप की सीधी चेतावनी

वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के बाद अब ट्रंप प्रशासन का रुख ग्रीनलैंड के प्रति और कड़ा हो गया है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि यदि कूटनीतिक बातचीत से बात नहीं बनी, तो अमेरिका ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने के लिए सैन्य बल का उपयोग करने से भी पीछे नहीं हटेगा। इस द्वीप की महत्ता यहाँ मौजूद दुर्लभ खनिज, यूरेनियम और लोहे के विशाल भंडारों के कारण और बढ़ गई है। ट्रंप की “जबरन कब्जे” वाली धमकी पर प्रतिक्रिया देते हुए डेनमार्क के नेताओं ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन बताया है। डेनमार्क का स्पष्ट मानना है कि ग्रीनलैंड कोई वस्तु नहीं है जिसे खरीदा या बेचा जा सके।

भारत से समर्थन की अपील: सांसद रास्मस जारलोव का बयान

डेनमार्क की रक्षा समिति के अध्यक्ष और सांसद रास्मस जारलोव ने इस संकट के बीच भारत का रुख महत्वपूर्ण बताया है। ANI को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि यद्यपि भौगोलिक रूप से ग्रीनलैंड भारत से बहुत दूर है, लेकिन यहाँ संप्रभुता और अखंडता के वैश्विक सिद्धांत दांव पर लगे हैं। जारलोव ने सवाल किया, “क्या भारत यह स्वीकार करेगा कि कोई विदेशी ताकत उसके किसी क्षेत्र पर दबाव या सैन्य बल से कब्जा करने की कोशिश करे?” उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत इस मामले में डेनमार्क का साथ देगा, क्योंकि किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना विश्व शांति के लिए अनिवार्य है।

“वफादार सहयोगियों को धमकी”: अमेरिका के बदलते तेवर पर सवाल

डेनमार्क लंबे समय से अमेरिका का एक भरोसेमंद सहयोगी रहा है। रास्मस जारलोव ने वेनेजुएला की घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका अब अपने ही दोस्तों को निशाना बना रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि ग्रीनलैंड में कोई अवैध गतिविधि, ड्रग तस्करी या तानाशाही सरकार नहीं है जिसे आधार बनाकर अमेरिका हस्तक्षेप को जायज ठहरा सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि ग्रीनलैंड पर किसी भी पड़ोसी देश से कोई खतरा नहीं है। जारलोव के अनुसार, अमेरिका का यह व्यवहार एक सहयोगी राष्ट्र की संप्रभुता का अपमान है और यह वैश्विक व्यवस्था को अराजकता की ओर धकेल सकता है।

चीन और रूस का डर ‘काल्पनिक’: जेडी वेंस के दावों का खंडन

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने हाल ही में दावा किया था कि रूस और चीन के मिसाइल हमलों से सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण जरूरी है। हालांकि, डेनिश सांसद जारलोव ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड में चीन की कोई सैन्य या आर्थिक मौजूदगी नहीं है। उन्होंने एक रोचक टिप्पणी करते हुए कहा कि ग्रीनलैंड में चीनी रेस्तरां ढूंढना भी मुश्किल है, तो वहां सैन्य खतरा कैसे हो सकता है? जारलोव ने यह भी रेखांकित किया कि अगर वाकई कोई खतरा होता, तो अमेरिका वहां अपने सैनिकों की संख्या 15,000 से घटाकर केवल 150 नहीं करता। इससे स्पष्ट है कि सुरक्षा के तर्क केवल कब्जे को जायज ठहराने के लिए गढ़े जा रहे हैं।

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