West Bengal Election 2026 : तृणमूल कांग्रेस ने किया सुप्रीम कोर्ट का रुख, चुनाव आयोग के बड़े फैसले को दी चुनौती

4 मई को होने वाली मतगणना से पहले बंगाल में नया कानूनी संकट खड़ा हो गया है। चुनाव आयोग ने केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर बनाने का आदेश दिया, जिसे टीएमसी ने भेदभावपूर्ण बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। क्या शीर्ष अदालत इस आदेश पर रोक लगाएगी?

West Bengal Election 2026

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मई 1, 2026

West Bengal Election 2026 : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों की घड़ी जैसे-जैसे करीब आ रही है, राज्य का राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। मतगणना से महज दो दिन पहले एक नया कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने मतगणना प्रक्रिया में तैनात होने वाले अधिकारियों की नियुक्तियों को लेकर अब देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है। यह विवाद मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि मतगणना की निगरानी कौन करेगा और इसमें किन कर्मचारियों की भूमिका अहम होगी।

सुप्रीम कोर्ट में टीएमसी की चुनौती: केंद्रीय कर्मचारियों पर अविश्वास

तृणमूल कांग्रेस ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस हालिया आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें चुनाव आयोग के एक खास फैसले को वैध ठहराया गया था। दरअसल, चुनाव आयोग ने आगामी मतगणना के लिए केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के कर्मियों को ही ‘काउंटिंग सुपरवाइजर’ नियुक्त करने का निर्णय लिया है। टीएमसी का तर्क है कि केवल केंद्रीय कर्मियों की नियुक्ति निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती है। पार्टी चाहती है कि इस प्रक्रिया में राज्य सरकार के कर्मचारियों को भी समान अवसर और भागीदारी दी जाए।

कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला और चुनाव आयोग के अधिकार

इससे पहले, टीएमसी ने इस मामले को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने टीएमसी की आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था है और उसे यह तय करने का पूर्ण अधिकार है कि वह चुनाव और मतगणना के कार्यों के लिए किन कर्मचारियों की सेवाएं लेना चाहता है। कोर्ट ने माना कि ऐसी नियुक्तियों में किसी भी प्रकार की ‘गैर-कानूनी’ बात या अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन नहीं हुआ है। हाईकोर्ट के अनुसार, निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना आयोग की जिम्मेदारी है और वह अपने संसाधनों का चयन करने के लिए स्वतंत्र है।

विवाद की जड़: सुपरवाइजर और सहायक पदों पर नियुक्तियां

टीएमसी की मुख्य आपत्ति इस बात पर है कि चुनाव आयोग ने मतगणना के दिन सुपरवाइजर और सहायक के महत्वपूर्ण पदों के लिए राज्य सरकार के कर्मचारियों को दरकिनार कर दिया है। पार्टी का आरोप है कि केंद्र सरकार के नियंत्रण वाले कर्मचारियों को प्राथमिकता देना एक विशेष राजनीतिक दल को लाभ पहुँचाने की कोशिश हो सकती है। टीएमसी नेताओं का दावा है कि राज्य के कर्मचारी भी उतने ही सक्षम और निष्पक्ष हैं, और उन्हें इस महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर रखना उनके मनोबल को गिराने जैसा है।

चुनाव आयोग का पक्ष: पारदर्शिता और निष्पक्षता की दलील

दूसरी ओर, भारतीय चुनाव आयोग (ECI) का हमेशा से यह रुख रहा है कि संवेदनशील राज्यों या उच्च-तनाव वाले चुनावों में केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती पारदर्शिता बढ़ाने के लिए की जाती है। आयोग का मानना है कि केंद्रीय और PSU कर्मचारियों के उपयोग से स्थानीय राजनीतिक दबाव की संभावना कम हो जाती है, जिससे मतगणना प्रक्रिया निर्बाध और निष्पक्ष तरीके से पूरी हो सके। आयोग ने कोर्ट में भी यह दलील दी है कि यह फैसला किसी विशेष दल के खिलाफ नहीं, बल्कि चुनाव की पवित्रता बनाए रखने के लिए लिया गया एक प्रशासनिक निर्णय है।

मतगणना से पहले बढ़ता तनाव और कानूनी लड़ाई का असर

4 मई को होने वाली मतगणना से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट में पहुंची यह याचिका काफी अहम मानी जा रही है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई हस्तक्षेप करता है, तो चुनाव आयोग को अंतिम समय में अपने इंतजामों में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। वहीं, यदि कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है, तो यह टीएमसी के लिए एक बड़ा झटका होगा। पश्चिम बंगाल की जनता और देश भर के राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी है, क्योंकि इस फैसले का सीधा असर मतगणना की पारदर्शिता और उसके बाद आने वाली राजनीतिक प्रतिक्रियाओं पर पड़ेगा। बंगाल में चुनावी मुकाबला पहले ही काफी कड़ा रहा है, और अब यह कानूनी जंग इसे और भी दिलचस्प बना रही है।

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