सुप्रीम कोर्ट की लिव-इन पर टिप्पणी: ’15 साल साथ रहे, बच्चा भी है, फिर यौन उत्पीड़न का आरोप क्यों?’

भोपाल जब कोई रिश्ता आपसी सहमति से बना हो, तो उसमें अपराध का सवाल ही कहां उठता है? सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महिला से यह सवाल पूछा. इस महिला ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके पूर्व लिव-इन पार्टनर के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया गया था. यह मामला शादी का झूठा वादा करके कथित यौन उत्पीड़न करने से जुड़ा था।  जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने उस मामले पर सवाल उठाया, जिसमें महिला 15 साल तक पुरुष के साथ रही और उनका एक 7

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Published On :

अप्रैल 27, 2026

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भोपाल

जब कोई रिश्ता आपसी सहमति से बना हो, तो उसमें अपराध का सवाल ही कहां उठता है? सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महिला से यह सवाल पूछा. इस महिला ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके पूर्व लिव-इन पार्टनर के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया गया था. यह मामला शादी का झूठा वादा करके कथित यौन उत्पीड़न करने से जुड़ा था। 

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने उस मामले पर सवाल उठाया, जिसमें महिला 15 साल तक पुरुष के साथ रही और उनका एक 7 साल का बच्चा भी है। 
 
एक न्यूज एजेंसी के हवाले से बताया गया कि जस्टिस नागरत्ना ने अपनी टिप्पणी में कहा, "जब रिश्ता आपसी सहमति से बना हो, तो उसमें अपराध का सवाल ही कहां उठता है? वे दोनों 15 साल साथ रह रहे, महिला का उस पुरुष से एक बच्चा भी है, लेकिन उनकी शादी नहीं हुई. अब वह यौन उत्पीड़न का आरोप लगा रही है?

'शादी का वादा' और कानूनी उपाय

महिला के वकील ने कोर्ट को बताया कि उसके पति का पहले ही निधन हो चुका था और उसके जीजा ने ही उसकी मुलाकात आरोपी से करवाई थी। 

कोर्ट को यह भी बताया गया कि आरोपी ने महिला से शादी करने का वादा किया था और उसका यौन शोषण किया था. तब अदालत ने पूछा, "शादी से पहले ही वह उस पुरुष के साथ जाकर क्यों रहने लगी?

उन्होंने कहा, "वह उसके साथ रही. उससे उसका एक बच्चा भी हुआ. अब वह पुरुष रिश्ता तोड़कर चला जाता है, क्योंकि उनके बीच शादी या कोई कानूनी बंधन नहीं है; लिव-इन रिलेशनशिप में ऐसा जोखिम तो रहता ही है. इसलिए जब वह रिश्ता तोड़कर चला जाता है, तो यह कोई अपराध नहीं बन जाता। 

जब महिला के वकील ने दलील दी कि आरोपी ने अपनी पहली शादी छिपाई और शादी का झूठा वादा किया, तो बेंच ने कहा, ''अगर उनकी शादी हुई होती, तो महिला के अधिकारों का मामला ज्यादा मजबूत होता. वह दूसरी शादी (Bigamy) के खिलाफ केस कर सकती थी. वह गुजारा-भत्ता (Maintenance) के लिए भी केस कर सकती थी. उसे वे सभी राहतें मिल सकती थीं. लेकिन अब, जब उनकी शादी ही नहीं हुई है और वे सिर्फ साथ रह रहे थे, तो इसमें यह जोखिम तो रहता ही है. वे किसी भी दिन रिश्ता तोड़कर अलग हो सकते हैं. अब हम इसमें क्या कर सकते हैं?

बच्चे का भविष्य और सुलह का रास्ता
उन्होंने सुझाव दिया कि महिला कुछ अन्य कानूनी उपायों का सहारा ले सकती है, जैसे कि बच्चे के लिए गुजारा-भत्ता की मांग करना. साथ ही उन्होंने दोनों पक्षों को आपसी सुलह (Mediation) के लिए जाने की सलाह दी। 

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, "भले ही वह पुरुष जेल चला जाए, लेकिन इससे महिला को क्या हासिल होगा? हम बच्चे के लिए कुछ गुजारा-भत्ते के बारे में सोच सकते हैं. बच्चा अब सात साल का हो चुका है. कम से कम बच्चे के लिए कुछ आर्थिक मुआवजे का इंतजाम तो किया ही जा सकता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक नोटिस जारी किया और पक्षों से यह पता लगाने को कहा कि क्या याचिकाकर्ता और आरोपी के बीच कोई समझौता हो सकता है। 

क्या है मामला?
बता दें कि यह मामला मध्य प्रदेश का है, जहां हाई कोर्ट ने पुरुष के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया था. महिला ने इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. महिला का दावा था कि पति की मृत्यु के बाद आरोपी ने उसे शादी का झांसा दिया और यौन शोषण किया। 

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