Mookambika Devi Temple: CM जोसेफ विजय ने कर्नाटक के कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर में की विशेष पूजा

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने हाल ही में कर्नाटक के कोल्लूर स्थित ऐतिहासिक मूकाम्बिका देवी मंदिर में दर्शन किए। 1200 साल पुराने इस प्राचीन मंदिर में उन्होंने 1.6 किलो चांदी की तलवार भेंट की। यह यात्रा धार्मिक आस्था और मंदिर की अनूठी पूजा पद्धति के साथ-साथ आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित इसकी ऐतिहासिक विरासत पर प्रकाश डालती है।

Mookambika Devi Temple

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

जून 13, 2026

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Mookambika Devi Temple: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने शुक्रवार, 12 जून को कर्नाटक के प्रसिद्ध मूकाम्बिका देवी मंदिर पहुंचकर अपनी आस्था प्रकट की। इस दौरान उन्होंने देवी के दर्शन कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। मंदिर के मुख्य पुजारी रामचंद्र अडिगा के मार्गदर्शन में यह धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ। इस अवसर पर मंदिर के पुजारियों ने मुख्यमंत्री विजय की कलाई पर ‘रक्षाधारा’ (रक्षासूत्र या कलावा) बांधी, जिसे दक्षिण भारत में शुभता का प्रतीक माना जाता है।

जीत के प्रतीक के रूप में भेंट की चांदी की तलवार

बताते चले कि, मुख्यमंत्री विजय ने मंदिर में लगभग 30 मिनट का समय व्यतीत किया। अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए उन्होंने मंदिर में 1.6 किलो वजनी चांदी की तलवार भेंट की। मुख्यमंत्री ने इसे ‘विजय’ (जीत) के प्रतीक के रूप में अर्पित किया और मंदिर प्रशासन से अनुरोध किया कि इस तलवार का उपयोग दैनिक पूजा-अर्चना में किया जाए। उडुपी जिले के बायंदूर तालुक में स्थित यह मंदिर न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1200 साल पुराना मूकाम्बिका मंदिर

मूकाम्बिका देवी का यह मंदिर कर्नाटक और केरल के निवासियों के लिए सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। लगभग 1200 साल पुराने इस मंदिर के पीछे महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य की संकल्पना जुड़ी है। मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने न केवल इस मंदिर के निर्माण का विचार दिया था, बल्कि उन्होंने स्वयं अपने हाथों से यहाँ देवी की प्रतिमा की स्थापना की थी।

आदि पराशक्ति और त्रिदेवी का संयुक्त स्वरूप

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मूकाम्बिका देवी को ‘आदि पराशक्ति’ का साक्षात अवतार माना गया है। उन्हें महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली (शक्ति) का संयुक्त स्वरूप माना जाता है। यही कारण है कि यह स्थान विद्यार्थियों और ज्ञान के उपासकों के लिए विशेष पूज्यनीय है। नवरात्रि के दौरान यहाँ विशेष उत्सवों का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अर्पित करने पहुंचते हैं।

मंदिर की अनूठी परंपराएं और श्रीचक्र की स्थापना

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ का ज्योतिर्लिंग है, जिसमें भगवान शिव और शक्ति दोनों का दिव्य समावेश है। किंवदंतियों के अनुसार, आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर में ‘श्रीचक्र’ की स्थापना की थी और यहाँ की पूजा पद्धति को सुव्यवस्थित किया था, जिसकी झलक आज भी यहाँ के अनुष्ठानों में दिखाई देती है। इसके अलावा, मंदिर परिसर में पंचमुखी गणेश जी की एक उत्कृष्ट और प्राचीन प्रतिमा भी स्थापित है, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहती है। विजयदशमी के समय इस तीर्थस्थल पर आयोजित होने वाले भव्य उत्सव पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं।

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