Voting Rights India : पश्चिम बंगाल में चुनावी पारा चढ़ा हुआ है, लेकिन इसी बीच राजधानी दिल्ली में देश की सबसे बड़ी अदालत में वोटर लिस्ट से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान एक बुनियादी और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि भारत में जन्मे किसी भी व्यक्ति को वोटर लिस्ट में शामिल होने और अपनी पसंद की सरकार चुनने का अटूट अधिकार है। अदालत की इस बात ने राज्य में राजनीतिक हलचल तेज कर दी है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस (TMC) इसे अपने पक्ष में एक बड़े चुनावी हथियार के रूप में देख रही है।
जस्टिस बागची की भावनात्मक और संवैधानिक दलील
CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि चुनाव के शोर-शराबे में हम लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अंधे होते जा रहे हैं। उनके अनुसार, जिस मिट्टी पर आपका जन्म हुआ है, वहां के चुनावी रजिस्टर में नाम होना सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक नागरिक की भावनात्मक देशभक्ति की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी राष्ट्रीयता का सबसे शुद्ध रूप है।
SIR प्रक्रिया और 2002 की वोटर लिस्ट का पेच
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने साल 2002 की वोटर लिस्ट का जिक्र करते हुए कहा कि मूल SIR (Special Intermittent Revision) प्रक्रिया में पुराने नामों की दोबारा जांच का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन मामलों को फिर से क्यों खंगाला गया जिनकी पहचान पुरानी लिस्ट से मेल खाती थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट को बढ़ाना या घटाना उनका मकसद नहीं है, बल्कि एक निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करना है।
हार-जीत का अंतर और वोटर्स को हटाने की दर
सुप्रीम कोर्ट ने एक तकनीकी लेकिन महत्वपूर्ण बिंदु पर पुनर्विचार की बात कही। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में 10% वोटर्स को लिस्ट से बाहर कर दिया जाता है और वहां जीत का अंतर महज 2% रहता है, तो ऐसे मामलों पर अदालत विशेष रूप से गौर करेगी। हालांकि, यदि जीत का अंतर बड़ा (जैसे 15%) है, तो चुनाव परिणाम की वैधता पर सवाल नहीं उठाए जाएंगे। यह टिप्पणी उन इलाकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है जहां कांटे की टक्कर होने की उम्मीद है।
34 लाख अपीलें और न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा
अदालत ने बताया कि अब तक अपीलीय फोरम में 34 लाख से अधिक अपीलें दर्ज की जा चुकी हैं। जस्टिस बागची ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यह चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच एक-दूसरे पर दोष मढ़ने का खेल नहीं है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं के बीच के टकराव में आम नागरिक या वोटर नहीं पिसना चाहिए। इसके साथ ही, कोर्ट ने आदेश दिया कि SIR प्रक्रिया में लगे न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा को सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना नहीं हटाया जाएगा और जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बलों की सुरक्षा जारी रहेगी।
चुनाव आयोग का पक्ष और अंतिम निर्णय
चुनाव आयोग की ओर से दलील दी गई कि बंगाल में वोटर्स को हटाने की दर (Deletion Rate) अन्य राज्यों के समान ही है और कुछ भी असामान्य नहीं किया जा रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल किसी भी नई अर्जी पर विचार करने से मना कर दिया और कहा कि पहले गठित किए गए 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल को अपना काम पूरा करने दें। CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि अदालत ट्रिब्यूनल के फैसलों का इंतजार करेगी और उसके बाद ही भविष्य की कार्रवाई पर कोई आदेश देगी।
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