Supreme Court CJI Suryakant News: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक हालिया और विवादास्पद फैसले को पलटते हुए महिला सुरक्षा और न्यायिक संवेदनशीलता पर एक नई लकीर खींच दी है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यौन अपराधों के मामलों में तकनीकी बारीकियों से ऊपर पीड़िता की गरिमा और आरोपी के इरादे को रखा जाना चाहिए।
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हाईकोर्ट के विवादित आदेश को सर्वोच्च अदालत ने किया खारिज
बताते चले कि, यह मामला उत्तर प्रदेश का है, जहां एक नाबालिग लड़की के साथ बर्बरता की कोशिश की गई थी। आरोपियों ने पीड़िता के पायजामे का नाड़ा तोड़ा और उसे खींचकर पुलिया के नीचे ले जाने का प्रयास किया। मार्च 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में इसे ‘बलात्कार का प्रयास’ मानने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट का तर्क था कि यह केवल अपराध की ‘तैयारी’ थी और इसे धारा 354 (महिला की गरिमा भंग करना) के तहत एक कम गंभीर अपराध माना जाना चाहिए। इस फैसले ने कानूनी हलकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच गहरा आक्रोश पैदा कर दिया था।
CJI सूर्यकांत की बेंच ने मामले पर कड़ा रुख अपनाया
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने दो टूक कहा कि किसी महिला के कपड़े उतारने की कोशिश करना या उसके अंतःवस्त्रों के साथ जबरदस्ती करना केवल ‘अश्लील हरकत’ नहीं है। पीठ के अनुसार, यौन हमले की मंशा से पायजामे का नाड़ा खोलना सीधे तौर पर रेप की श्रेणी (Attempt to Rape) में आता है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा POCSO एक्ट और आईपीसी की धारा 376 के तहत तय किए गए सख्त आरोप बिल्कुल सही थे।
न्यायिक संवेदनशीलता और करुणा की आवश्यकता पर शीर्ष अदालत का जोर
फैसला सुनाते समय जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायिक दर्शन पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कोई भी न्यायाधीश तब तक न्याय नहीं कर सकता जब तक वह मामले के तथ्यों और पीड़िता की असहाय स्थिति के प्रति संवेदनशील न हो। कोर्ट ने माना कि फैसलों में केवल शुष्क कानूनी सिद्धांतों का पालन काफी नहीं है; उनमें करुणा, सहानुभूति और सामाजिक वास्तविकता का समावेश होना अनिवार्य है। संवेदनशीलता के अभाव में न्यायिक संस्थान अपने बुनियादी कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल साबित होंगे।
जजों की ट्रेनिंग के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एनजीओ ‘वी द वुमन’ की संस्थापक शोभा गुप्ता के पत्र पर स्वतः संज्ञान लिया था। अब भविष्य में ऐसी न्यायिक त्रुटियों को रोकने के लिए कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक, पूर्व जस्टिस अनिरुद्ध बोस को एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया है। यह समिति यौन अपराधों से जुड़े संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए जजों हेतु ‘सरल भाषा वाले दिशा-निर्देश’ तैयार करेगी। इसका उद्देश्य निचली अदालतों और हाईकोर्ट के जजों में लैंगिक संवेदनशीलता (Gender Sensitivity) विकसित करना है।









