Supreme Court: मुस्लिम पर्सनल लॉ पर सुनवाई, अदालत ने कहा- UCC का धर्म से कोई संबंध नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

अप्रैल 17, 2026

Supreme Court: भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर चल रही लंबी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और दूरगामी टिप्पणी की है। मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि UCC का किसी विशेष धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह एक ‘संवैधानिक आकांक्षा’ है।

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संवैधानिक पीठ की सुनवाई और केंद्र को नोटिस

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की विशेष पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सरकार से इस विषय पर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि शरीयत कानून के तहत विरासत और उत्तराधिकार के नियम भेदभावपूर्ण हैं और वर्तमान संवैधानिक ढांचे के अनुरूप नहीं हैं। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि UCC को केवल धार्मिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इसका मूल उद्देश्य नागरिक अधिकारों में एकरूपता लाना है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ और अनुच्छेद 25 का तर्क

मामले की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत के समक्ष कड़े तर्क रखे। उन्होंने दलील दी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत पूर्ण संरक्षण प्राप्त नहीं है। भूषण का कहना था कि यदि अदालत शरीयत के उन प्रावधानों को रद्द कर देती है जो समानता के अधिकार का हनन करते हैं, तो मुस्लिम समुदाय पर भी ‘भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम’ लागू किया जा सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) संविधान से ऊपर नहीं हो सकते।

समानता का अधिकार बनाम जटिल उत्तराधिकार नियम

याचिकाकर्ता ‘न्याय नारी फाउंडेशन’ और पौलोमी पाविनी शुक्ला की ओर से दायर इस याचिका में मुख्य रूप से अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के उल्लंघन का मुद्दा उठाया गया है। दलीलों के दौरान यह बात सामने आई कि 1937 के एक्ट के तहत विरासत के नियम इतने जटिल हैं कि उन्हें समझना सामान्य नागरिकों और कभी-कभी वकीलों के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि वर्तमान व्यक्तिगत कानून महिलाओं और पुरुषों के बीच विरासत के मामले में भेदभाव करते हैं। 1937 का एक्ट आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों और लैंगिक समानता के विरुद्ध है। न्यायसंगत समाज के लिए पूरे देश में एक समान नागरिक संहिता लागू करना अनिवार्य है।

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