Supreme Court Big Step: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र के नाम दिए गए ईंधन संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के संदेश का असर अब देश की शीर्ष अदालत में भी दिखने लगा है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक मिसाल पेश करते हुए जजों और कर्मचारियों के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने स्वेच्छा से यह बड़ा निर्णय लिया है कि वे अब व्यक्तिगत सरकारी वाहनों के बजाय ‘कार-पूलिंग’ (साझा वाहन व्यवस्था) के माध्यम से कोर्ट पहुंचेंगे। इस पहल का मुख्य उद्देश्य सरकारी बेड़े में वाहनों की संख्या को नियंत्रित करना और पेट्रोल-डीजल की खपत में भारी कटौती करना है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि यदि न्यायपालिका के शीर्ष स्तर से ऐसी शुरुआत होती है, तो यह समाज में ऊर्जा संरक्षण और सादगी का एक सशक्त संदेश देगी।
न्यायिक कार्यप्रणाली में बदलाव
अदालती कार्यवाही को अत्याधुनिक बनाने और आवाजाही से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और डिजिटल हियरिंग को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है। नए नियमों के मुताबिक, अब प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार को मुकदमों की सुनवाई केवल ‘वर्चुअल मोड’ में ही आयोजित की जाएगी। न्यायिक प्रक्रिया के इस डिजिटलीकरण से न केवल सरकारी संसाधनों और ईंधन की बचत होगी, बल्कि देश के दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले वकीलों और वादियों को भी दिल्ली आने की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे उनके समय और धन की भी बड़ी बचत होगी।
कर्मचारियों के लिए हाइब्रिड वर्क मॉडल
सुप्रीम कोर्ट ने केवल जजों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी रजिस्ट्री और प्रशासनिक स्टाफ के लिए भी हाइब्रिड वर्क कल्चर और रोटेशन आधारित कार्यप्रणाली को लागू किया है। कोर्ट ने कर्मचारियों के लिए आंशिक रूप से ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ (WFH) की व्यवस्था को हरी झंडी दे दी है। इस ग्रीन और स्मार्ट वर्क मॉडल के तहत कर्मचारी अब रोटेशन के आधार पर घर से ही अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकेंगे। इस कदम से कार्यालय तक पहुंचने के लिए इस्तेमाल होने वाले निजी और सरकारी संसाधनों के उपयोग में कमी आएगी, जो सीधे तौर पर पर्यावरण सुधार और ‘डिजिटल इंडिया’ के विजन को मजबूती प्रदान करेगा।










