Supreme Court: CJI सूर्यकांत भावुक, 15 साल की बच्ची के दर्द पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल की दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात मामले में सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। CJI सूर्यकांत ने भावुक होते हुए कहा कि उस बच्ची के दर्द की भरपाई कोई नहीं कर सकता, इसलिए सरकार को नागरिकों की व्यक्तिगत पसंद और उनकी गरिमा का सम्मान करना चाहिए।

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

अप्रैल 30, 2026

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय रेप पीड़िता की 31 सप्ताह की गर्भावस्था से जुड़े मामले में सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। यह मामला महिलाओं के अपने शरीर पर अधिकार और व्यक्तिगत पसंद के सम्मान से जुड़ा हुआ है, जिसे अदालत ने बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण बताया। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत इस मामले को लेकर भावुक नजर आए और उन्होंने सरकार की ओर से पेश की गई दलीलों पर कड़ा रुख अपनाया।

दरअसल, सरकार ने अदालत के उस पहले के आदेश के खिलाफ क्यूरेटिव याचिका दायर की थी, जिसमें गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी गई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह के फैसले को चुनौती देने का अधिकार केवल पीड़िता या उसके परिवार के पास होना चाहिए, न कि सरकार के पास।

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पीड़िता के दर्द को लेकर अदालत की चिंता

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा कि रेप के बाद उस बच्ची ने जो मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेली है, उसकी भरपाई किसी भी रूप में संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “नागरिकों का सम्मान करें, मैडम,” और यह भी जोड़ा कि सरकार को इस तरह के मामलों में संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी इस दौरान कहा कि अदालत व्यक्तिगत पसंद और अधिकारों का सम्मान करती है, और सरकार को भी यही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अदालत ने यह संकेत दिया कि पीड़िता की इच्छा और उसके परिवार की सहमति इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण होनी चाहिए।

सरकार की दलील और AIIMS रिपोर्ट

सरकार की ओर से पेश दलीलों में कहा गया कि इस अवस्था में गर्भावस्था को समाप्त करना चिकित्सकीय रूप से संभव नहीं है। ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि यह याचिका अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की रिपोर्ट के आधार पर दाखिल की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, गर्भपात कराने की स्थिति में बच्ची के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा हो सकता है। साथ ही, यह भी आशंका जताई गई कि पैदा होने वाला बच्चा गंभीर शारीरिक विकृतियों से ग्रसित हो सकता है। सरकार का कहना था कि इस परिस्थिति में बच्ची के पास केवल एक विकल्प बचता है—बच्चे को जन्म देना और उसे गोद देने के लिए सौंप देना।

व्यक्तिगत अधिकार बनाम चिकित्सा जटिलताएं

यह मामला एक ओर जहां चिकित्सा जटिलताओं से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर यह महिलाओं के अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भी महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पीड़िता की इच्छा और उसकी परिस्थितियों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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