Stock Market Crash: शेयर बाजार में ब्लैक थर्सडे, अचानक 1200 अंक टूटा सेंसेक्स, मची भारी अफरा-तफरी

आज दलाल स्ट्रीट पर मानों मातम का माहौल था। सुबह हरे निशान में खुलने के बाद, अचानक दोपहर होते-होते बाजार ताश के पत्तों की तरह ढह गया। सेंसेक्स के 1200 अंकों की गिरावट ने निवेशकों के दिलों की धड़कन बढ़ा दी है। क्या यह सिर्फ वैश्विक तनाव है या कोई बड़ा खतरा?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 19, 2026

Stock Market Crash : भारतीय शेयर बाजार के लिए गुरुवार, 19 फरवरी का दिन बेहद निराशाजनक रहा। सप्ताह के चौथे कारोबारी दिन बाजार की शुरुआत से ही बिकवाली का दबाव देखा गया, जो दिन चढ़ते-चढ़ते एक बड़ी गिरावट में तब्दील हो गया। सेंसेक्स 850 अंकों से अधिक लुढ़क गया, वहीं निफ्टी 50 ने भी 25,567.75 के निचले स्तर को छू लिया। इस चौतरफा बिकवाली ने केवल लार्ज-कैप शेयरों को ही नहीं, बल्कि मिड-कैप और स्मॉल-कैप सूचकांकों को भी अपनी चपेट में लिया, जो आधा प्रतिशत से ज्यादा गिरकर बंद हुए। बाजार में आई इस अचानक मंदी ने निवेशकों के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

मार्केट कैप में बड़ी सेंध: निवेशकों की गाढ़ी कमाई पर चली कैंची

इस गिरावट का सबसे भयावह असर निवेशकों की संपत्ति पर पड़ा है। बीएसई (BSE) में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण (Market Cap) ₹472 लाख करोड़ से घटकर लगभग ₹468 लाख करोड़ के स्तर पर आ गया। महज एक कारोबारी सत्र में निवेशकों की संपत्ति से करीब ₹4 लाख करोड़ स्वाहा हो गए। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इस गिरावट ने पिछले कुछ दिनों की बढ़त पर पानी फेर दिया है, जिससे ट्रेडर्स अब अधिक सावधानी बरत रहे हैं।

मुनाफावसूली का दबाव: निवेशकों ने सुरक्षित किया अपना लाभ

बाजार के जानकारों के अनुसार, इस क्रैश का एक प्रमुख कारण ‘प्रॉफिट बुकिंग’ है। पिछले तीन सत्रों से बाजार में लगातार तेजी देखी जा रही थी। बजट की घोषणाओं और आरबीआई की नीतियों जैसे बड़े घटनाक्रमों के बाद बाजार में कोई नया सकारात्मक घरेलू ट्रिगर मौजूद नहीं था। ऐसे में ऊंचे स्तरों पर निवेशकों ने मुनाफावसूली करना बेहतर समझा, जिससे बाजार का संतुलन बिगड़ गया और बिकवाली का दौर शुरू हो गया।

अमेरिकी फेड और वैश्विक अनिश्चितता: विभाजित राय ने बढ़ाई चिंता

अमेरिकी फेडरल रिजर्व की हालिया बैठक के मिनट्स ने वैश्विक बाजारों में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार, फेड अधिकारी भविष्य की ब्याज दरों को लेकर एकमत नहीं हैं। कुछ अधिकारी महंगाई कम होने की स्थिति में दरें घटाने के पक्ष में हैं, जबकि अन्य सख्त रुख अपनाने की चेतावनी दे रहे हैं। फेड की इस मिली-जुली नीति के कारण डॉलर इंडेक्स मजबूत हुआ है, जिससे भारतीय बाजार जैसे उभरते बाजारों से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के बाहर निकलने का खतरा बढ़ गया है।

भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की आंच: वैश्विक संकट का असर

मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव भारतीय बाजार के लिए नकारात्मक साबित हो रहा है। अमेरिकी सेना द्वारा ईरान पर संभावित हमले की खबरों (CNN और Axios के अनुसार) ने निवेशकों को सुरक्षित विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है। सप्ताहांत से पहले युद्ध की आशंका के चलते लोग रिस्की एसेट्स से पैसा निकाल रहे हैं। इसके साथ ही, कच्चे तेल (WTI और ब्रेंट क्रूड) की कीमतों में आई तेजी ने कोढ़ में खाज का काम किया है। तेल का बड़ा आयातक होने के नाते, ऊंची कीमतें भारत के चालू खाता घाटे और रुपये की सेहत के लिए बड़ा खतरा हैं।

नए सकारात्मक संकेतों का इंतजार और बाजार का मिजाज

फिलहाल भारतीय बाजार में किसी बड़े सकारात्मक ट्रिगर की कमी खल रही है। हालांकि विशेषज्ञ 2026 के अंत तक बाजार में सुधार की उम्मीद जता रहे हैं, लेकिन मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों के ऊंचे वैल्यूएशन ने जोखिम बढ़ा दिया है। आने वाले दिनों में बाजार ‘रेंज-बाउंड’ यानी एक सीमित दायरे में रह सकता है। निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे वैश्विक संकेतों और युद्ध की खबरों पर पैनी नजर रखें।

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