Historical Recovery: स्मिथसोनियन म्यूजियम भारत को लौटाएगा तीन दुर्लभ कांस्य मूर्तियां, सांस्कृतिक विरासत की जीत

भारत की खोई हुई विरासत की घर वापसी: क्या आप जानते हैं कि दशकों पहले स्मगलिंग के जरिए अमेरिका पहुँची तीन दुर्लभ कांस्य मूर्तियाँ आखिरकार वापस आ रही हैं? स्मिथसोनियन म्यूजियम और भारत सरकार के बीच हुए इस ऐतिहासिक समझौते ने कैसे दुनिया भर में कलाकृतियों की वापसी का नया रास्ता खोल दिया है? जानिए इन मूर्तियों का रहस्य।

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 30, 2026

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Historical Recovery: न्यूयॉर्क स्थित स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन के नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने भारत सरकार को तीन बहुमूल्य प्राचीन कांस्य मूर्तियां वापस करने की घोषणा की है। म्यूजियम द्वारा की गई गहन जांच और विस्तृत प्रोवेनेंस रिसर्च में यह स्पष्ट हुआ कि ये मूर्तियां भारत के तमिलनाडु राज्य के विभिन्न मंदिरों से चोरी की गई थीं। इस निर्णय को सांस्कृतिक धरोहर की वापसी के लिए चल रहे वैश्विक प्रयासों की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

दक्षिण भारतीय कांस्य कला की अनुपम धरोहर

ये तीनों मूर्तियां दक्षिण भारत की समृद्ध कांस्य कला परंपरा की उत्कृष्ट मिसाल हैं। ऐतिहासिक रूप से इनका उपयोग मंदिरों में पूजा-अर्चना और धार्मिक शोभायात्राओं के दौरान किया जाता था। न केवल इनका धार्मिक महत्व है, बल्कि ये मूर्तियां कला, शिल्प और इतिहास के दृष्टिकोण से भी अत्यंत मूल्यवान मानी जाती हैं।

शिव नटराज: चोल काल की अद्वितीय कृति

इन मूर्तियों में सबसे प्रमुख है शिव नटराज की कांस्य प्रतिमा, जो चोल काल (लगभग 990 ईस्वी) की है। यह मूर्ति भगवान शिव को तांडव नृत्य की मुद्रा में दर्शाती है, जो सृष्टि, संहार और पुनर्जन्म के ब्रह्मांडीय चक्र का प्रतीक है। इसका संबंध तमिलनाडु के तंजावुर जिले के श्री भावा औषधेश्वर मंदिर से है, जहां इसे 1957 में फोटोग्राफ किया गया था।

सोमस्कंद और संत सुंदरार की ऐतिहासिक मूर्तियां

दूसरी मूर्ति सोमस्कंद की है, जो 12वीं शताब्दी की चोल कालीन रचना है। इसमें भगवान शिव, देवी पार्वती और कार्तिकेय को एक साथ दर्शाया गया है। यह मूर्ति तमिलनाडु के अलत्तूर गांव स्थित विश्नाथ मंदिर से जुड़ी रही है। तीसरी प्रतिमा विजयनगर काल (16वीं शताब्दी) की है, जिसमें नयनार संत सुंदरार और उनकी पत्नी परवई को दर्शाया गया है। इसे 1956 में वीरासोलापुरम गांव के शिव मंदिर में दर्ज किया गया था।

चोरी और अवैध तस्करी का खुलासा

म्यूजियम के अनुसार, इन मूर्तियों की उत्पत्ति की जांच में फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पॉन्डिचेरी के फोटो आर्काइव्स, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का सहयोग लिया गया। जांच से सामने आया कि 1950 के दशक में इन मूर्तियों को मंदिरों से चुराकर अवैध रूप से विदेश भेजा गया था। कुछ मामलों में फर्जी दस्तावेजों के जरिए इन्हें अंतरराष्ट्रीय कला बाजार में बेचा गया।

समझौते के तहत लौटाई जाएंगी मूर्तियां

भारत सरकार और स्मिथसोनियन म्यूजियम के बीच हुए समझौते के अनुसार, शिव नटराज की मूर्ति को दीर्घकालिक ऋण पर म्यूजियम में ही प्रदर्शित रखा जाएगा। इससे म्यूजियम को मूर्ति की पूरी यात्रा—उसकी उत्पत्ति, चोरी और भारत को वापसी—की कहानी सार्वजनिक रूप से साझा करने का अवसर मिलेगा। यह प्रतिमा म्यूजियम की स्थायी प्रदर्शनी में शामिल रहेगी, जबकि सोमस्कंद और संत सुंदरार विद परवई की मूर्तियां भारतीय दूतावास के माध्यम से भारत भेजी जाएंगी।

सांस्कृतिक विरासत की वापसी की दिशा में अहम कदम

यह फैसला स्मिथसोनियन के दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई कला संग्रह की व्यापक समीक्षा का हिस्सा है, जिसमें सांस्कृतिक संपदा को लेकर नैतिक जिम्मेदारी पर विशेष जोर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी पहलें भारत की लुप्त होती सांस्कृतिक धरोहर को पुनः स्थापित करने में मददगार साबित होंगी और दुनिया भर में लूटी गई कलाकृतियों की वापसी की दिशा में एक सकारात्मक उदाहरण पेश करेंगी।

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