Rajesh Exports : राजेश एक्सपोर्ट्स पर 15 लाख करोड़ की हेराफेरी का आरोप, LIC को भी लगा झटका

मार्केट रेगुलेटर सेबी ने दिग्गज गोल्ड कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स और उसके प्रमोटर राजेश मेहता पर करीब ₹15.15 लाख करोड़ के रेवेन्यू में भारी हेराफेरी का सनसनीखेज आरोप लगाया है। कंपनी में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाली सरकारी संस्था एलआईसी भी इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद कैसे भारी संकट में आ फंसी? जानिए।

Rajesh Exports

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जून 5, 2026

Rajesh Exports :  भारत की जानी-मानी गोल्ड रिफाइनिंग और आभूषण निर्माण कंपनियों में शुमार राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड इन दिनों एक बहुत बड़े वित्तीय विवाद के भंवर में फंस गई है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने कंपनी और उसके चेयरमैन व प्रबंध निदेशक (CMD) राजेश मेहता के खिलाफ एक सख्त अंतरिम आदेश जारी किया है। नियामक का आरोप है कि कंपनी ने वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच अपने कुल राजस्व और वास्तविक वित्तीय स्थिति को लेकर आम निवेशकों के सामने बेहद भ्रामक और गलत आंकड़े पेश किए। सेबी के इस कड़े एक्शन के बाद शेयर बाजार में कंपनी के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई और गुरुवार को इसमें लोअर सर्किट लग गया। इस बड़ी गिरावट के कारण कंपनी में भारी-भरकम निवेश रखने वाली भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के शेयरों पर भी बुरा असर पड़ा और वे आज 1% तक टूट गए।

सेबी की जांच में हुआ ₹15.15 लाख करोड़ के फर्जीवाड़े का दावा

बाजार नियामक सेबी द्वारा की गई प्रारंभिक जांच में बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। सेबी के मुताबिक, राजेश एक्सपोर्ट्स ने वित्त वर्ष 2021 से 2025 के दौरान अपने मुख्य कारोबार से जुड़े रेवेन्यू को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रदर्शित किया था। जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कंपनी ने इस अवधि में लगभग ₹15.15 लाख करोड़ के कंसोलिडेटेड रेवेन्यू (एकीकृत राजस्व) की गलत और फर्जी रिपोर्टिंग की। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि कथित तौर पर कंपनी का 99.8% राजस्व असलियत से कोसों दूर और सिर्फ कागजों पर ज्यादा दिखाया गया था। इसके अलावा, SEBI ने कंपनी के प्रमोटर और उनसे जुड़ी विभिन्न संदिग्ध संस्थाओं के माध्यम से फंड के हेरफेर को लेकर भी कई गंभीर सवाल उठाए हैं।

कौन हैं राजेश मेहता: मात्र 1200 रुपये से शुरू किया था सफर

राजेश एक्सपोर्ट्स को इस मुकाम तक पहुंचाने वाले राजेश मेहता का जन्म 20 जून 1964 को बेंगलुरु में हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा सेंट जोसेफ स्कूल से पूरी की। बहुत ही कम उम्र में वे अपने पिता के पारंपरिक जूलरी व्यवसाय से जुड़ गए थे। साल 1980 के दशक में उन्होंने अपने भाई प्रशांत मेहता के साथ मिलकर चांदी के आभूषणों का एक छोटा सा स्वतंत्र काम शुरू किया था। इस कारोबार की शुरुआत के लिए उन्होंने अपने बड़े भाई से मात्र 1200 रुपये उधार लिए थे। अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत धीरे-धीरे उन्होंने अपने इस छोटे से व्यापार को दक्षिण भारत के राज्यों सहित गुजरात और मुंबई जैसे देश के बड़े सर्राफा बाजारों तक फैला दिया।

छोटे कारोबार से ग्लोबल फॉर्च्यून कंपनी बनने की कहानी

साल 1995 राजेश मेहता के व्यावसायिक जीवन का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, जब राजेश एक्सपोर्ट्स ने भारतीय शेयर बाजार में कदम रखा और अपने आईपीओ (IPO) के जरिए करीब 10 करोड़ रुपये जुटाए। इसके बाद कंपनी ने गोल्ड रिफाइनिंग, बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग और रिटेल चेन के कारोबार में आक्रामक तरीके से कदम आगे बढ़ाए। कंपनी को वैश्विक स्तर पर असली और बड़ी पहचान साल 2015 में मिली, जब उसने स्विट्जरलैंड की दुनिया की मशहूर और सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनरी वाल्कैम्बी (Valcambi) का अधिग्रहण कर लिया। यह ऐतिहासिक डील लगभग 400 मिलियन डॉलर में पूरी तरह से कैश पेमेंट के जरिए की गई थी, जिसने दुनिया भर के कॉर्पोरेट जगत को चौंका दिया था।

वित्तीय नियंत्रण के चलते कानूनी घेरे में आए प्रमोटर

सेबी द्वारा जारी अंतरिम आदेश के अनुसार, राजेश मेहता ही कंपनी के भीतर सभी वित्तीय और रणनीतिक फैसले लेने वाले मुख्य व्यक्ति थे। पूरी कंपनी की फाइनेंशियल एक्टिविटी पर उनका सीधा और पूर्ण नियंत्रण था। इसी सीधे उत्तरदायित्व के कारण नियामक ने कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें अगली सूचना या अगले आदेश तक शेयर बाजार में किसी भी प्रकार की प्रतिभूतियों (शेयर्स) की खरीद-बिक्री या ट्रेडिंग करने से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है।

LIC के करोड़ों रुपये दांव पर

राजेश एक्सपोर्ट्स के इस बड़े संकट ने देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी एलआईसी की भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। दरअसल, राजेश एक्सपोर्ट्स में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की कुल 10.80% की बड़ी हिस्सेदारी है। सेबी की इस दंडात्मक कार्रवाई के बाद जैसे ही कंपनी के स्टॉक धराशायी हुए, उसका सीधा नकारात्मक असर एलआईसी के पोर्टफोलियो और उसके सार्वजनिक निवेश पर देखने को मिला। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि सेबी द्वारा लगाए गए यह वित्तीय विसंगतियों के आरोप अदालत और आगे की जांच में पूरी तरह सच साबित हो जाते हैं, तो यह भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास में हाल के वर्षों का सबसे बड़ा और बेहद गंभीर ‘कॉर्पोरेट गवर्नेंस’ (कॉर्पोरेट कुप्रबंधन) विवाद बन सकता है।

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