Sambhal Violence Case: संभल हिंसा में पूर्व सीओ अनुज चौधरी की जीत, हाईकोर्ट ने रोक दी FIR

संभल हिंसा के दौरान चर्चा में आए पूर्व सीओ अनुज चौधरी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है। निचली अदालत के एफआईआर दर्ज करने के कड़े आदेश पर हाईकोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। क्या यह फैसला संभल मामले की पूरी दिशा बदल देगा?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 10, 2026

Sambhal Violence Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल हिंसा मामले में पूर्व सर्कल ऑफिसर (CO) अनुज कुमार चौधरी और अन्य पुलिसकर्मियों को बड़ी राहत दी है। मंगलवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने संभल की निचली अदालत के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। निचली अदालत ने यह आदेश भीड़ पर कथित तौर पर गोली चलाने के आरोप में दिया था। हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद अब मामले की अगली सुनवाई 24 फरवरी को तय की गई है।

यामीन की शिकायत और बेटे की मौत का पूरा मामला

यह विवाद यामीन नामक व्यक्ति की शिकायत से शुरू हुआ था। यामीन का आरोप है कि 24 नवंबर, 2024 को सुबह लगभग 8:45 बजे उनका बेटा आलम संभल के मोहल्ला कोट स्थित जामा मस्जिद के पास पपीते और बिस्कुट बेच रहा था। शिकायत के अनुसार, उसी समय पुलिसकर्मियों ने जान से मारने की नीयत से भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिससे स्थिति गंभीर हो गई। इसी घटना को आधार बनाकर यामीन ने तत्कालीन सीजेएम (CJM) विभांशु सुधीर की अदालत में न्याय की गुहार लगाई थी।

सीजेएम कोर्ट का सख्त रुख: “ऑफिशियल ड्यूटी” की आड़ नहीं ले सकती पुलिस

तत्कालीन सीजेएम विभांशु सुधीर ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत यामीन की अर्जी मंजूर की थी। अपने 11 पन्नों के विस्तृत आदेश में मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट किया था कि पुलिस अधिकारी आपराधिक कृत्य करने के लिए “सरकारी कर्तव्य” का सहारा नहीं ले सकते। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा था कि किसी निहत्थे व्यक्ति पर गोली चलाना आधिकारिक काम का हिस्सा नहीं माना जा सकता। कोर्ट का मानना था कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) बनता है और सच्चाई केवल निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकती है।

हाईकोर्ट में राज्य सरकार की दलीलें: BNSS की प्रक्रियाओं का उल्लंघन

इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG) मनीष गोयल ने पुलिस का पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि सीजेएम ने एफआईआर का आदेश देते समय BNSS की धारा 175 के तहत निर्धारित कानूनी सुरक्षा उपायों की अनदेखी की है। एएजी ने जोर देकर कहा कि धारा 175(4) विशेष रूप से सरकारी कर्मचारियों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान किए गए कार्यों के खिलाफ अनावश्यक और परेशान करने वाले मुकदमों से बचाने के लिए बनाई गई है।

‘फोरम शॉपिंग’ और प्रक्रियात्मक खामियों का आरोप

सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि शिकायतकर्ता सीधे अदालत पहुँच गया, जबकि कानूनन पहले पुलिस स्टेशन जाना अनिवार्य है। एएजी गोयल ने निचली अदालत के आदेश को “कानूनी सीमाओं का उल्लंघन” बताते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस की उस रिपोर्ट को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जिसमें बताया गया था कि घटना की जांच पहले से ही चल रही है। उन्होंने इसे ‘फोरम शॉपिंग’ (अपनी सुविधा अनुसार अदालत चुनना) का मामला बताया और कहा कि संभल हिंसा कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि एक बड़े हंगामे का हिस्सा थी जिसे नियंत्रित करना पुलिस की मजबूरी थी।

आगामी सुनवाई और पुलिस अधिकारियों का भविष्य

हाईकोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के बाद अब 24 फरवरी की तारीख इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण होगी। अनुज कुमार तोमर और अनुज कुमार चौधरी जैसे अधिकारियों के लिए यह राहत फिलहाल अस्थायी है, लेकिन सरकार के कड़े रुख से यह संकेत मिलता है कि वह अपने अधिकारियों के एक्शन का बचाव करने के लिए प्रतिबद्ध है। कोर्ट अब यह तय करेगा कि क्या मजिस्ट्रेट को इस तरह के संवेदनशील मामलों में एफआईआर का आदेश देने का वैधानिक अधिकार था या नहीं।

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