West Bengal Name Change : पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘बांग्ला’ करने की तृणमूल कांग्रेस सरकार की पुरानी कोशिश के बाद अब भारतीय जनता पार्टी ने राज्य का नाम ‘पश्चिम बंगाल’ ही रखने की बात कही है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने सोमवार को कहा कि विधानसभा के अगले सत्र में इस संबंध में बिल लाया जाएगा। पार्टी का कहना है कि राज्य का आधिकारिक नाम सभी भाषाओं में ‘पश्चिम बंगाल’ होना चाहिए।
अंग्रेजी में भी West Bengal नाम रखने की तैयारी
शमिक भट्टाचार्य ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राज्य के लिए ‘पश्चिम बंगाल’, ‘बंगाल’ या ‘पश्चिम बांग्ला’ जैसे अलग-अलग नाम इस्तेमाल नहीं किए जाएंगे। उनके मुताबिक अंग्रेजी में भी राज्य का नाम ‘West Bengal’ ही रखा जाना चाहिए। उन्होंने इसे राज्य के ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ से जुड़ा मुद्दा बताया।

नाम बदलने की पुरानी मांग फिर चर्चा में
पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की मांग नई नहीं है। प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय से यह तर्क दिया जाता रहा है कि अंग्रेजी वर्णक्रम के कारण केंद्र की बैठकों में पश्चिम बंगाल का नंबर अक्सर अंत में आता है। इसी वजह से राज्य के नाम में बदलाव का विचार वाम मोर्चा सरकार के समय भी सामने आया था।
1999 में पहली बार विधानसभा में उठा प्रस्ताव
20 जुलाई 1999 को पश्चिम बंगाल विधानसभा में राज्य का नाम बदलने का प्रस्ताव रखा गया था। शुरुआत में सभी भाषाओं में ‘West Bengal’ नाम रखने की बात सामने आई, लेकिन चर्चा के बाद ‘बांग्ला’ नाम को लेकर सहमति बनाने की कोशिश हुई। उस समय वाम मोर्चा सरकार के साथ विपक्षी कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की ओर से भी प्रस्ताव में बदलाव किए गए थे।

ममता सरकार ने 2016 में फिर शुरू की प्रक्रिया
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने 2016 में नाम बदलने की प्रक्रिया को दोबारा आगे बढ़ाया। 2 अगस्त 2016 को राज्य कैबिनेट ने प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें बंगाली में ‘बांग्ला’, अंग्रेजी में ‘बंगाल’ और हिंदी में ‘बंगाल’ नाम रखने की बात थी। हालांकि, इस प्रस्ताव को विपक्षी दलों की आपत्तियों का सामना करना पड़ा।
2018 में विधानसभा ने ‘बांग्ला’ प्रस्ताव पास किया
26 जुलाई 2018 को पश्चिम बंगाल विधानसभा ने राज्य का नाम ‘बांग्ला’ करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया। प्रस्ताव को केंद्र सरकार की मंजूरी के लिए भेजा गया था। हालांकि, पड़ोसी देश बांग्लादेश से नाम की समानता को लेकर भी आपत्तियां सामने आई थीं। तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र से प्रक्रिया आगे बढ़ाने का अनुरोध किया था।
केंद्र ने तीन नामों वाले प्रस्ताव पर जताई आपत्ति
नाम बदलने के प्रस्ताव को केंद्रीय गृह मंत्रालय की मंजूरी जरूरी थी। केंद्र ने पहले वाले प्रस्ताव को वापस भेजते हुए कहा था कि राज्य का एक ही नाम होना चाहिए, अलग-अलग भाषाओं में अलग नाम नहीं। इसके बाद 2018 में ‘बांग्ला’ नाम वाला प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, लेकिन नाम बदलने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया
किसी राज्य का नाम बदलने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना होता है। पहले संबंधित राज्य की विधानसभा प्रस्ताव पारित करती है। इसके बाद केंद्र सरकार विभिन्न संबंधित विभागों से राय लेती है। मंजूरी मिलने पर संसद में विधेयक पेश किया जाता है। दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद नाम परिवर्तन प्रभावी होता है।
संसद में बिल नहीं आने से प्रक्रिया अधूरी
पूर्व में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद में लिखित जवाब में बताया था कि पश्चिम बंगाल का नाम बदलने से संबंधित कोई विधेयक संसद में पेश नहीं किया गया है। ऐसे में विधानसभा से प्रस्ताव पारित होने के बावजूद संवैधानिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।
अब BJP के प्रस्ताव से फिर बढ़ी हलचल
करीब ढाई दशक से चल रहे इस नाम विवाद के बीच बीजेपी के नए ऐलान ने मुद्दे को फिर राजनीतिक चर्चा में ला दिया है। अब नजर विधानसभा के अगले सत्र पर रहेगी, जहां पार्टी की ओर से प्रस्तावित बिल पेश किए जाने की बात कही गई है। हालांकि, इस प्रक्रिया का अंतिम रूप क्या होगा, यह विधानसभा और उसके बाद केंद्र की संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
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