Sabarimala Row: मंदिर परंपरा या समानता का अधिकार? सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच में बहस तेज

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के अधिकार और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं के बीच सुप्रीम कोर्ट में 'महामंथन' जारी है। क्या संवैधानिक नैतिकता किसी धर्म की परंपराओं में हस्तक्षेप कर सकती है? 9 जजों की पीठ के सामने उठ रहे ये सवाल देश की कानूनी व्यवस्था को हमेशा के लिए बदल सकते हैं।

Sabarimala Row

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 9, 2026

Sabarimala Row: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के ऐतिहासिक और विवादित मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का दौर जारी है। मंगलवार को लगातार तीसरे दिन की कार्यवाही के दौरान केंद्र सरकार ने मंदिरों की सदियों पुरानी परंपराओं का बचाव किया। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) केएम नटराज ने अदालत को संबोधित करते हुए कहा कि भारत में मंदिरों की विविधता अत्यंत व्यापक है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में मदिरा को प्रसाद के रूप में अर्पित किया जाता है। एएसजी ने तर्क दिया कि ये परंपराएं आस्था का विषय हैं और किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह इन रीति-रिवाजों को अपनी आधुनिक पसंद के आधार पर बदलने की मांग करे।

भोजन और संप्रदाय की स्वतंत्रता: एएसजी की दलीलें

सुनवाई के दौरान एएसजी ने एक और महत्वपूर्ण उदाहरण पेश किया। उन्होंने कहा कि कई मंदिरों में केवल शाकाहारी भोजन परोसा जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी अंतरात्मा या पसंद का हवाला देकर वहां मांसाहारी भोजन की मांग करता है, तो उसे ऐसा करने का अधिकार नहीं है। एएसजी के अनुसार, किसी खास धार्मिक संप्रदाय की अपनी नियमावली होती है और बाहरी व्यक्ति को उन श्रद्धालुओं के सामूहिक अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यह दलील इस बात पर जोर देने के लिए दी गई कि धार्मिक स्थलों के अपने नियम होते हैं, जिन्हें व्यक्तिगत अधिकारों के नाम पर चुनौती नहीं दी जानी चाहिए।

जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी: समावेशी हिंदू धर्म और एकता पर जोर

सरकार की दलीलों के बीच जस्टिस नागरत्ना ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि मंदिरों में प्रवेश को केवल एक विशिष्ट समुदाय या वर्ग तक सीमित कर दिया जाए, तो यह हिंदू धर्म की मूल भावना के विपरीत होगा। जस्टिस नागरत्ना ने ‘देवरु केस’ का संदर्भ देते हुए कहा कि अतीत में ऐसे प्रयास हुए हैं जहां केवल एक खास ब्राह्मण समुदाय को ही मंदिर में प्रवेश की अनुमति थी, जिसे न्यायालय ने गलत माना था। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हर समुदाय अपना अलग दायरा बनाकर दूसरों को रोकेगा, तो समाज में दूरियां बढ़ेंगी और राष्ट्रीय एकता कमजोर होगी।

26 सालों की कानूनी जंग और 2018 का ऐतिहासिक फैसला

धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का यह कानूनी मामला पिछले 26 वर्षों से देश की अदालतों की दहलीज पर है। ज्ञात हो कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से एक क्रांतिकारी फैसला सुनाते हुए सबरीमाला मंदिर में हर आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। हालांकि, इस फैसले के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए और दर्जनों पुनर्विचार याचिकाएं (Review Petitions) दायर की गईं। वर्तमान में, 9 जजों की संवैधानिक बेंच इन्हीं याचिकाओं के माध्यम से धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और महिलाओं के अधिकारों के संतुलन पर विचार कर रही है।

सुनवाई का कार्यक्रम: अप्रैल के अंत तक आ सकता है महत्वपूर्ण मोड़

सुप्रीम कोर्ट की यह विशेष बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक लगातार इस मामले से जुड़ी 50 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। न्यायालय ने समय-सारणी निर्धारित करते हुए बताया कि रिव्यू पिटीशनरों और उनके समर्थकों को 7 से 9 अप्रैल तक अपनी दलीलें रखने का समय दिया गया है। वहीं, मंदिर की परंपराओं का समर्थन करने वाले और परिवर्तन का विरोध करने वाले पक्षकार 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक अपनी बात रखेंगे। यह सुनवाई न केवल सबरीमाला बल्कि अन्य धर्मों में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के व्यापक दायरे को भी परिभाषित करेगी।

निष्कर्ष: आस्था और समानता के बीच न्याय की तलाश

सबरीमाला मामला केवल एक मंदिर के प्रवेश का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के बीच के संघर्ष का प्रतीक बन गया है। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच के सामने चुनौती यह है कि वह सदियों पुरानी परंपराओं का सम्मान करते हुए आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों को कैसे सुरक्षित रखती है। समाज के सभी वर्गों की निगाहें अब 22 अप्रैल तक चलने वाली इस गहन सुनवाई पर टिकी हैं, जो भविष्य की सामाजिक और धार्मिक दिशा तय करेगी।

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