Ramadan 2026: माह-ए-रमजान 2026 की शुरुआत 19 फरवरी से भारत में हो चुकी है और देशभर के मुस्लिम समुदाय के लोग पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ रोजे रख रहे हैं। 25 फरवरी को सातवां रोजा पूरा होने के बाद अब 26 फरवरी, गुरुवार को रमजान का आठवां रोजा रखा जाएगा। यह पवित्र महीना इबादत, सब्र और नेकी का प्रतीक माना जाता है।
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इस्लाम के पांच स्तंभों में रोजे का स्थान
इस्लाम धर्म पांच मूल स्तंभों पर आधारित है—कलिमा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज। इन सिद्धांतों पर आस्था रखना हर मुसलमान के लिए आवश्यक माना गया है। इन्हीं में से एक प्रमुख स्तंभ है रोजा, जो आत्मसंयम और अल्लाह की इबादत का महत्वपूर्ण माध्यम है।
कुरान शरीफ में रोजे की अहमियत बताते हुए कहा गया है कि “ऐ ईमान वालो! तुम पर रोजा रखना फर्ज किया गया है, जैसा कि तुमसे पहले लोगों पर फर्ज किया गया था, ताकि तुम परहेज़गार बनो।” (सूरह अल-बक़रह 2:183) यह आयत इस बात को स्पष्ट करती है कि रोजा सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।
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आठवें रोजे की खासियत

रमजान का हर दिन अपनी विशेष अहमियत रखता है। 26 फरवरी को रखा जाने वाला आठवां रोजा भी इबादत और नेक अमल के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन रोजेदार अपने कर्मों में और अधिक सच्चाई, सब्र और परहेज़गारी अपनाने की कोशिश करते हैं। रोजा रखने का उद्देश्य आत्मसंयम, दया, करुणा और समाज के जरूरतमंद लोगों के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाना है। इस पवित्र महीने में लोग ज्यादा से ज्यादा दुआ, तिलावत और नेक कामों में समय बिताते हैं।
सहरी और इफ्तार का सही समय जरूरी
रोजे की शुरुआत सुबह फज्र की अजान से पहले सहरी करने से होती है। सहरी वह भोजन है, जो सूर्योदय से पहले किया जाता है ताकि पूरे दिन ऊर्जा बनी रहे। शाम को सूर्यास्त के समय इफ्तार के जरिए रोजा खोला जाता है। सही समय पर सहरी और इफ्तार करना बेहद जरूरी है, क्योंकि यही रोजे की पूर्णता का आधार होता है। इसलिए रोजेदार अपने-अपने शहर के समय के अनुसार सहरी और इफ्तार का पालन करते हैं।
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प्रमुख शहरों में सहरी-इफ्तार का समय
देश के अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और सूर्यास्त का समय भिन्न होता है, इसलिए सहरी और इफ्तार के समय में भी अंतर होता है। दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, कानपुर और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में लोग स्थानीय समय के अनुसार रोजा रखते और खोलते हैं। रोजेदारों को सलाह दी जाती है कि वे अपने शहर के अधिकृत इस्लामिक कैलेंडर या स्थानीय मस्जिद द्वारा जारी समय-सारणी के अनुसार सहरी और इफ्तार का समय सुनिश्चित करें।
आध्यात्मिक अनुशासन और सामाजिक एकता का प्रतीक

रमजान केवल व्यक्तिगत इबादत का महीना नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे का भी प्रतीक है। इस दौरान लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं, जरूरतमंदों को भोजन कराते हैं और दान-पुण्य के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। आठवां रोजा भी इसी श्रृंखला का हिस्सा है, जो रोजेदारों को आध्यात्मिक मजबूती और नैतिकता की राह पर आगे बढ़ने का अवसर देता है।
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