Putin on Greenland: ग्रीनलैंड विवाद पर पुतिन का बड़ा बयान, अमेरिका-यूरोप तनाव के बीच रूस ने झाड़ा पल्ला

ग्रीनलैंड पर पुतिन की 'चुप्पी' के पीछे का राज: क्या रूस और अमेरिका के बीच बन रही है कोई नई धुरी? जब पूरी दुनिया ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप और यूरोप के बीच परमाणु युद्ध जैसी स्थिति देख रही थी, तब पुतिन ने यह कहकर सबको हैरान कर दिया कि 'यह हमारा विषय नहीं है'। आखिर पुतिन ने क्यों कहा कि ग्रीनलैंड की कीमत महज $1 बिलियन है? क्या पुतिन ट्रंप के विस्तारवादी इरादों को मौन समर्थन दे रहे हैं?

Putin on Greenland

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 22, 2026

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Putin on Greenland: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को हासिल करने की महत्वाकांक्षा ने वैश्विक राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। ट्रंप द्वारा धन या सैन्य शक्ति के उपयोग की संभावना जताने के बाद, नाटो (NATO) के प्रमुख यूरोपीय देशों—ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी—ने अमेरिका के दबाव के खिलाफ एकजुटता प्रदर्शित की है। ग्रीनलैंड वर्तमान में डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है और नाटो का हिस्सा है, जिसके कारण ट्रंप के इस रुख ने गठबंधन की स्थिरता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पुतिन का स्पष्ट रुख: “रूस का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं”

बुधवार रात रूस की नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की बैठक को संबोधित करते हुए पुतिन ने ग्रीनलैंड विवाद पर अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड के भविष्य के साथ रूस का कोई सरोकार नहीं है। पुतिन ने कहा, “ग्रीनलैंड का क्या होता है, इससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है। यह पश्चिमी देशों का आपसी मामला है और मुझे विश्वास है कि वे इसे आपस में ही सुलझा लेंगे।” पुतिन की यह टिप्पणी दिखाती है कि रूस फिलहाल इस विवाद में सीधे तौर पर कूदकर पश्चिमी देशों के बीच जारी आंतरिक कलह को दूर से ही देखना चाहता है।

इतिहास के पन्नों से पुतिन ने दिलायी अलास्का और वर्जिन आइलैंड्स की याद

अपने संबोधन के दौरान पुतिन ने ऐतिहासिक उदाहरणों का जिक्र करते हुए इस मामले को रोचक मोड़ दिया। उन्होंने याद दिलाया कि क्षेत्रों की खरीद-फरोख्त का इतिहास पुराना है। पुतिन ने उल्लेख किया कि साल 1917 में डेनमार्क ने ही वर्जिन आइलैंड्स को अमेरिका को बेच दिया था। इसके साथ ही उन्होंने रूस द्वारा 1867 में अलास्का को महज 7.2 मिलियन अमेरिकी डॉलर में अमेरिका को बेचने की घटना का भी स्मरण कराया। पुतिन ने कहा कि हालांकि डेनमार्क ने ग्रीनलैंड के साथ हमेशा एक ‘कॉलोनी’ जैसा सख्त व्यवहार किया है, लेकिन वर्तमान विवाद में किसी तीसरे पक्ष की दिलचस्पी की जरूरत नहीं है।

डेनमार्क और ग्रीनलैंड के संबंधों पर कटाक्ष

पुतिन ने डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर शासन करने के तरीके पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि डेनमार्क ने ग्रीनलैंड को एक स्वायत्त क्षेत्र के बजाय एक उपनिवेश (Colony) की तरह माना है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि डेनमार्क ने क्रूरता तो नहीं की, लेकिन शासन में काफी सख्ती जरूर बरती है। पुतिन के इस बयान को डेनमार्क के ऊपर एक रणनीतिक कटाक्ष के रूप में देखा जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि रूस इस क्षेत्र की आंतरिक राजनीतिक स्थिति पर बारीक नजर रखे हुए है।

ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर रूस का रणनीतिक रुख

ग्रीनलैंड के अलावा, पुतिन ने डोनाल्ड ट्रंप की एक और प्रमुख पहल ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर भी अपनी राय रखी। ट्रंप ने गाजा में शांति बहाली के लिए इस बोर्ड का गठन किया है और इसमें शामिल होने के लिए रूस, भारत और अन्य देशों के नेताओं को आमंत्रित किया है। इस न्योते पर पुतिन ने कहा कि रूस अपने रणनीतिक साझेदारों से व्यापक सलाह-मशविरा करने के बाद ही इस बोर्ड में शामिल होने पर कोई अंतिम फैसला लेगा। यह बयान पुतिन की उस कूटनीति को दर्शाता है जिसमें वे किसी भी अमेरिकी पहल का हिस्सा बनने से पहले अपने सहयोगियों के हितों को प्राथमिकता देना चाहते हैं।

नाटो की एकता के लिए बड़ी चुनौती

ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति ने न केवल डेनमार्क को नाराज किया है, बल्कि नाटो के भीतर एक गहरी दरार पैदा कर दी है। पुतिन का इस मामले से दूरी बनाना यह संकेत देता है कि रूस इस समय अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच बढ़ते अविश्वास का लाभ कूटनीतिक रूप से उठाना चाहता है। यदि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका का दबाव बढ़ता है, तो यह शीत युद्ध के बाद नाटो के सबसे बड़े संकट के रूप में उभर सकता है।

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