जंगल, जमीन और फसल में बसती है जनजातीय दीपावली की खुशियां

भोपाल  दीपावली का पर्व देशभर में रोशनी, खुशियों और समृद्धि के उत्सव के रूप में मनाया जाता है, लेकिन जनजातीय अंचलों में इस पर्व का स्वरूप कुछ अलग और बेहद खास है। यहां दीपावली केवल घरों को रोशन करने या धन-संपत्ति की पूजा करने का त्योहार नहीं, बल्कि जंगल, जमीन, जल, फसल, पशु- पक्षियों और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर भी है। जनजातीय समाज की सदियों पुरानी लोक परंपराओं में दीपावली का हर दिन प्रकृति के साथ उसके गहरे रिश्ते की कहानी कहता है। पांच दिवसीय दीपावली पर्व के दौरान कहीं वनदेवी और ठाकुर बाबा के स्थान

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Published On :

नवम्बर 7, 2026

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भोपाल 

दीपावली का पर्व देशभर में रोशनी, खुशियों और समृद्धि के उत्सव के रूप में मनाया जाता है, लेकिन जनजातीय अंचलों में इस पर्व का स्वरूप कुछ अलग और बेहद खास है। यहां दीपावली केवल घरों को रोशन करने या धन-संपत्ति की पूजा करने का त्योहार नहीं, बल्कि जंगल, जमीन, जल, फसल, पशु- पक्षियों और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर भी है। जनजातीय समाज की सदियों पुरानी लोक परंपराओं में दीपावली का हर दिन प्रकृति के साथ उसके गहरे रिश्ते की कहानी कहता है। पांच दिवसीय दीपावली पर्व के दौरान कहीं वनदेवी और ठाकुर बाबा के स्थान पर दीपदान किया जाता है, तो कहीं खेतों में दीप जलाकर अच्छी फसल और खुशहाली की कामना की जाती है।

दीपावली की रात वनांचल के गांवों में उत्सव का अलग ही रंग दिखाई देता है। स्थानीय परंपरा में इसे 'दिवाली जगाने' का रिवाज कहा जाता है। ग्रामीण एक स्थान पर एकत्रित होकर ढोल-मांदर की थाप पर पारंपरिक लोकनृत्य करते हैं। यह उत्सव केवल दीपावली की रात तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोकनृत्य और सामूहिक उल्लास का सिलसिला एकादशी तक जारी रहता है। ग्रामीण टोलियां बनाकर गांव के प्रत्येक घर पहुंचती हैं और पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत करती हैं। इस दौरान घर-घर खुशियां बांटने के साथ आपसी मेलजोल और सामाजिक एकजुटता का संदेश भी दिया जाता है।

नई पीढ़ी तक पहुंच रही सांस्कृतिक विरासत

जनजातीय समाज की दीपावली हमें यह समझाती है कि त्योहारों का वास्तविक आनंद केवल रोशनी और उत्सव में नहीं, बल्कि अपनी प्रकृति, परंपराओं और जीवन के आधार के प्रति सम्मान में भी छिपा है। जहां घरों में दीपक खुशियों का उजाला फैलाते हैं, वहीं खेतों में जलने वाले दीप मेहनत और अन्न के महत्व को रेखांकित करते हैं। वनदेवी, ठाकुर बाबा और बघासुर के स्थान पर किया जाने वाला दीपदान जंगल और वन्यजीवों के साथ आत्मीय रिश्ते को जीवंत रखता है।

पांच दिवसीय दीपावली के बाद एकादशी तक चलने वाले लोकनृत्य, सामूहिक पूजा और पारंपरिक अनुष्ठान जनजातीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान हैं। यह लोक परंपरा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ प्रकृति संरक्षण, सामुदायिक सद्भाव और श्रम के सम्मान का संदेश भी देती है। जनजातीय अंचलों की यह दीपावली वास्तव में जंगल, जमीन और जीवन के प्रति कृतज्ञता का पर्व है।

 

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