Pran Pratishtha Swaminarayan 108 feet Statue: स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर में आज एक ऐतिहासिक क्षण देखने को मिलेगा। यहां युवा स्वामीनारायण की 108 फीट ऊंची नीलकंठ वर्णी मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की जाएगी। इस भव्य समारोह का नेतृत्व वैश्विक BAPS संस्था के प्रमुख ब्रह्मस्वरूप महंतस्वामी महाराज करेंगे। मूर्ति की स्थापना के लिए मंदिर परिसर में विशेष अनुष्ठान और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं।
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मूर्ति की विशेषता

यह मूर्ति पांच धातुओं से निर्मित है और दुनिया की पहली ऐसी प्रतिमा है जो भगवान के कठिन तप की मिसाल पेश करती है। मूर्ति की सबसे खास बात यह है कि यह एक पैर पर खड़ी है, जो तपस्या और त्याग का प्रतीक है। इस आयोजन में यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया समेत दुनियाभर से लगभग 300 संत और महंत शामिल हो रहे हैं।
महंतस्वामी महाराज का आगमन
नीलकंठ वर्णी की विशाल प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर महंतस्वामी महाराज 19 मार्च को दिल्ली पहुंचे। उनके स्वागत के लिए 21 मार्च को विशेष सभा आयोजित की गई। इसके बाद 22 मार्च को पंचकुला और कुरुक्षेत्र में नवनिर्मित BAPS स्वामीनारायण मंदिरों की मूर्ति प्रतिष्ठा भी संपन्न हुई।
नीलकंठ वर्णी की अद्भुत यात्रा
भगवान स्वामीनारायण को ही नीलकंठ वर्णी कहा जाता है। मात्र 11 वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़कर लोककल्याण के लिए सात वर्षों तक कठिन आध्यात्मिक यात्रा की। इस दौरान उन्होंने लगभग 12 हजार किलोमीटर की दूरी तय की।
उत्तर भारत में हिमालय, बदरीनाथ, केदारनाथ और कैलाश मानसरोवर तक पहुंचे।
नेपाल में मुक्तिनाथ धाम का दर्शन किया।
पूर्व में कामाख्या देवी मंदिर तक यात्रा की।
दक्षिण भारत में रामेश्वरम और पुरी जगन्नाथ धाम गए।

पश्चिम भारत में द्वारका, नासिक और पंढरपुर जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों का भ्रमण किया।
इस कठिन यात्रा के दौरान उन्हें नीलकंठ वर्णी नाम मिला। उनकी यह यात्रा त्याग, तपस्या और लोककल्याण की प्रेरणा देती है।
अक्षरधाम मंदिर में नीलकंठ वर्णी की 108 फीट ऊंची मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भगवान स्वामीनारायण की तपस्या और त्याग की गाथा को जीवंत करने वाला क्षण है। यह आयोजन न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व के श्रद्धालुओं के लिए आस्था और भक्ति का अद्वितीय पर्व बन गया है।









