Nikant Jain Case: एक करोड़ रिश्वत केस में निकांत जैन को राहत, हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार का मुकदमा रद्द किया

भ्रष्टाचार के जिस मामले ने पूरे महकमे में हड़कंप मचा दिया था, उसमें अब एक ऐसी कानूनी जीत हुई है जिसने जांच एजेंसियों को सन्न कर दिया है। एक करोड़ की रिश्वत के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे निकांत जैन के खिलाफ हाईकोर्ट ने मुकदमा रद्द करने का फैसला क्यों सुनाया?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 10, 2026

Nikant Jain Case : एक करोड़ रुपये की रिश्वत मांगने के चर्चित और हाई-प्रोफाइल मामले में आरोपी निकांत जैन को बड़ी कानूनी राहत मिली है। लखनऊ हाईकोर्ट ने अवैध वसूली और भ्रष्टाचार से जुड़े पूरे आपराधिक मुकदमे को रद्द कर दिया है। यह वही मामला है, जिसने उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में हलचल मचा दी थी और कई वरिष्ठ अधिकारियों पर सवाल खड़े कर दिए थे।

न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ का आदेश

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ ने की। निकांत जैन की ओर से दाखिल याचिका पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं बनता। अदालत ने इसी आधार पर पूरे आपराधिक प्रकरण को खारिज कर दिया।हाईकोर्ट ने अपने आदेश में 15 मई 2025 को दाखिल की गई चार्जशीट और 17 मई 2025 को जारी तलबी आदेश को भी रद्द कर दिया। अदालत का मानना था कि जांच एजेंसियां ऐसे कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सकीं, जिनके आधार पर आरोपों को आगे बढ़ाया जा सके। इससे अभियोजन की पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े हो गए।

सोलर कंपनी से रिश्वत मांगने का था आरोप

पूरा मामला एक सोलर उपकरण बनाने वाली कंपनी से जुड़ा था। आरोप लगाया गया था कि सोलर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने की मंजूरी के बदले परियोजना लागत के 5 प्रतिशत, यानी करीब एक करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी गई थी। यह मांग कथित तौर पर बिचौलिये के रूप में निकांत जैन के जरिए की गई थी, जिससे मामला और गंभीर हो गया।इस प्रकरण में IAS अधिकारी अभिषेक प्रकाश को भी आरोपी बनाया गया था और फिलहाल वह निलंबित चल रहे हैं। आरोप था कि उन्होंने कारोबारी से कमीशन की मांग निकांत जैन के माध्यम से कराई। व्यवसायी विश्वजीत दत्ता ने इसकी शिकायत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की थी, जिसके बाद STF से जांच कराई गई और कार्रवाई हुई।

मुकदमा रद्द होने से बहाली की उम्मीद

अब जब हाईकोर्ट ने पूरा मुकदमा ही रद्द कर दिया है, तो अभिषेक प्रकाश की बहाली की संभावना भी बढ़ गई है। प्रशासनिक सूत्रों का मानना है कि कानूनी अड़चन हटने के बाद सरकार जल्द ही उनके निलंबन की समीक्षा कर सकती है। इस फैसले का असर नौकरशाही के भीतर भी साफ देखा जा रहा है।मामले में एक अहम मोड़ तब आया, जब शिकायतकर्ता ने स्वयं कोर्ट के सामने स्वीकार किया कि शिकायत गलतफहमी के आधार पर दर्ज कराई गई थी। यह एफआईआर 20 मार्च 2025 को गोमती नगर थाने में दर्ज हुई थी, जो कंपनी के प्रतिनिधि द्वारा मुख्यमंत्री को भेजी गई शिकायत पर आधारित थी।

बचाव पक्ष के तर्क और अदालत की टिप्पणी

निकांत जैन की ओर से अदालत को बताया गया कि आरोप अस्पष्ट हैं और उनके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। न तो कोई रकम दी गई, न कोई संपत्ति सौंपी गई और न ही किसी तरह की धमकी के प्रमाण मिले। अदालत ने यह भी माना कि कथित एक करोड़ रुपये की कोई बरामदगी नहीं हुई और रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है, जिससे अपराध साबित हो सके।हाईकोर्ट के इस फैसले को उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए अहम माना जा रहा है। जहां एक ओर आरोपी को बड़ी राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर यह फैसला जांच प्रक्रिया और शिकायतों की सत्यता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार आगे क्या कदम उठाती है।