Mohan Bhagwat on Gen Z: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में युवाओं को धर्म और जीवन के संबंध को लेकर संबोधित किया। उज्जैन में 17 से 19 सितंबर तक राष्ट्रीय युवा धर्म संसद-2026 का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से युवा और अन्य प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं। आयोजन का उद्देश्य धर्म, भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों पर संवाद करना है।
युवा धर्म संसद सुनकर खुशी हुई: मोहन भागवत
मोहन भागवत ने कहा कि जब उन्होंने युवा धर्म संसद के बारे में सुना तो उन्हें खुशी हुई। उनके मुताबिक, आज के समय में युवाओं के बीच धर्म को लेकर बातचीत कम सुनने को मिलती है। उन्होंने कहा कि धर्म पर चर्चा होते ही अक्सर इसे उम्रदराज लोगों से जोड़ दिया जाता है, जबकि उनका मानना है कि धर्म को जीवन के किसी एक पड़ाव तक सीमित नहीं किया जा सकता।

गीता और रामायण को रिटायरमेंट की किताब न मानें
भागवत ने कहा कि समाज में यह धारणा दिखाई देती है कि गीता और रामायण जैसी पुस्तकों को रिटायरमेंट के बाद पढ़ा जाना चाहिए। उन्होंने इस सोच को सही नहीं बताया। उनके अनुसार धर्म व्यक्ति के अस्तित्व और जीवन की शुरुआत से अंत तक जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि दुनिया में कई चीजें व्यक्ति की इच्छा से नहीं, बल्कि निश्चित नियमों के अनुसार संचालित होती हैं।
सूर्य का उदाहरण देकर समझाया धर्म का अर्थ
अपने संबोधन में भागवत ने सूर्य का उदाहरण देते हुए कहा कि उसका अस्तित्व और उसका उगना-डूबना व्यक्ति के विश्वास पर निर्भर नहीं है। उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति किसी चीज में विश्वास करे या नहीं, इससे प्रकृति के नियम नहीं बदलते। उनके मुताबिक, जीवन में भी कुछ व्यवस्थाएं और नियम ऐसे हैं, जो व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छा से अलग अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं।

अहंकार से पैदा होती है सब कुछ नियंत्रित करने की सोच
भागवत ने कहा कि जब व्यक्ति अहंकार के कारण यह मानने लगता है कि हर चीज उसके नियंत्रण में है और सब कुछ उसकी इच्छा के अनुसार होना चाहिए, तब उसे गलतफहमी हो सकती है। उन्होंने युवाओं के सामने धर्म को समझने के लिए अपने पूर्वाग्रहों और धारणाओं से बाहर निकलने की जरूरत पर जोर दिया।
धर्म को समझने के लिए मन को खाली रखना जरूरी
मोहन भागवत ने कहा कि धर्म इतना व्यापक विषय है कि इसकी खोज और समझ में पूरा जीवन बीत सकता है। उन्होंने कहा कि धर्म को समझने से पहले व्यक्ति को अपने मन में पहले से मौजूद धारणाओं को एक तरफ रखने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि वे खुद धर्म के विशेषज्ञ नहीं हैं और उद्घाटन भाषण से पहले उनके मन में भी कई विचार चल रहे थे।
सृष्टि की शुरुआत से धर्म के अस्तित्व की बात
भागवत ने कहा कि उनके लिए धर्म जन्म से मृत्यु तक रहने वाला विषय है। उन्होंने कहा कि सृष्टि की शुरुआत से धर्म मौजूद है और आगे भी रहेगा। उनके मुताबिक रिश्ते और सामाजिक संबंध भी पहले मौजूद थे और भविष्य में भी बने रहेंगे। उन्होंने कहा कि जीवन के सुख और मोक्ष की अवधारणा को भी धर्म से जोड़ा जाता है।

किसी भी परिस्थिति में धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए
अपने संबोधन में RSS प्रमुख ने कहा कि व्यक्ति को परिस्थितियां कैसी भी हों, धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। उन्होंने धर्म को जीवन की दिशा से जोड़ते हुए कहा कि इसे केवल पूजा-पद्धति या उम्र के किसी विशेष पड़ाव तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार धर्म जीवन के व्यापक नियमों और जिम्मेदारियों से संबंधित विषय है।
सेकुलरिज्म और रिलिजन को लेकर भी रखी अपनी बात
मोहन भागवत ने सेकुलरिज्म के संदर्भ में कहा कि भारत में धर्म शब्द के अर्थ को समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी दुनिया में इस्तेमाल होने वाले ‘रिलिजन’ शब्द को धर्म के समान मान लिया गया है, जबकि उनके अनुसार दोनों की अवधारणाओं में अंतर है। उनका कहना था कि अपनी भाषा और परंपरा में मौजूद धर्म की अवधारणा को उसके व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए।
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