Kerala Women Controversy: मुस्लिम धर्मगुरु के बयान पर कांग्रेस भड़की, महिलाओं के अधिकारों को लेकर घमासान

केरल में महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी को लेकर मुस्लिम धर्मगुरु कांथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार की टिप्पणी ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस नेताओं ने महिलाओं को घर तक सीमित रखने वाली सोच का विरोध किया, जबकि IUML ने टिप्पणी का बचाव किया। अब यह मुद्दा धर्म, संविधान और महिला अधिकारों की बहस बन गया है।

Kerala Women Controversy

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

सितम्बर 2, 2026

Kerala Women Controversy:  केरल में महिलाओं की भूमिका को लेकर दिए गए एक बयान ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है। सुन्नी इस्लामिक विद्वान कांतापुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार के उस बयान पर केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन ने कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें महिलाओं को घर के भीतर रहने की बात कही गई थी। सतीशन ने कहा कि इस तरह की सोच केरल की प्रगतिशील सामाजिक परंपरा और महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी के अनुरूप नहीं है।

वी.डी. सतीशन ने बयान से असहमति जताई

राज्य कैबिनेट की बैठक के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में वी.डी. सतीशन ने कांतापुरम के बयान पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह इस विचार से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि महिलाओं की भूमिका केवल घर तक सीमित होनी चाहिए। उनके मुताबिक केरल ने शिक्षा, सामाजिक सुधार और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में लंबे समय से प्रगतिशील सोच को अपनाया है और इस तरह का नजरिया उस परंपरा से मेल नहीं खाता।

महिलाओं की हर क्षेत्र में भागीदारी जरूरी

सतीशन ने कहा कि महिलाएं केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित रहने के लिए नहीं हैं। उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने और समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा कि राजनीति, शिक्षा, प्रशासन, कारोबार, सामाजिक सेवा और अन्य क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी समाज को मजबूत करती है। उनके अनुसार यही केरल के प्रगतिशील दृष्टिकोण की पहचान है।

इस्लामी इतिहास के उदाहरणों का दिया हवाला

वी.डी. सतीशन ने अपने तर्क के समर्थन में इस्लामी इतिहास के विभिन्न उदाहरणों का भी उल्लेख किया। उन्होंने रानी बिलकिस का उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास में ऐसी महिलाओं का जिक्र मिलता है, जिन्होंने शासन और नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने कहा कि इस्लामी इतिहास में कारोबार करने वाली महिला, सैन्य नेतृत्व से जुड़ी महिला और रानी के रूप में भूमिका निभाने वाली महिलाओं के उदाहरण मौजूद हैं।

खलीफा के दौर की घटना का किया जिक्र

सतीशन ने खलीफाओं के शासनकाल से जुड़ी एक घटना का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि एक महिला ने विवाह के समय दिए जाने वाले मेहर से संबंधित एक फैसले पर सवाल उठाया था। उनके अनुसार उस समय शासक ने महिला के तर्क को सही माना था। सतीशन ने कहा कि इस तरह के ऐतिहासिक उदाहरण बताते हैं कि महिलाओं को महत्वपूर्ण सामाजिक और सार्वजनिक मामलों में अपनी बात रखने का अधिकार प्राप्त था।

महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका पर जोर

विपक्ष के नेता ने कहा कि महिलाओं की सामाजिक भागीदारी को सीमित करने वाली सोच को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनका तर्क था कि इतिहास में महिलाओं ने परिवार और समाज दोनों के स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। ऐसे में उन्हें सार्वजनिक जीवन से दूर रखने की बात आधुनिक और प्रगतिशील समाज की अवधारणा के विपरीत है। उन्होंने कांतपुरम के विचार से स्पष्ट दूरी बनाई।

क्या कहा था कांतपुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार ने?

विवाद की शुरुआत रविवार को कोच्चि में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कांतपुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार के संबोधन से हुई। उन्होंने कहा था कि महिलाओं को अपने घर के भीतर रहना चाहिए। उनका दावा था कि महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर खुले तौर पर आना समाज के लिए नुकसानदेह हो सकता है। उन्होंने इस विचार को इस्लाम में पर्दा और महिलाओं के घर में रहने से संबंधित मान्यताओं से जोड़कर पेश किया।

सौ साल पुरानी परंपरा का किया दावा

कांतपुरम ने अपने बयान में कहा था कि पिछले करीब 100 वर्षों से संगठन के विद्वान इसी तरह की शिक्षा देते आ रहे हैं। उनके मुताबिक इसी परंपरा के कारण महिलाओं का सम्मान कायम रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई संगठन या राजनीतिक नेता उनके विचारों का विरोध करता है, तब भी वह धार्मिक नियमों के आधार पर अपनी बात कहते रहेंगे।

बयान पर बढ़ी बहस

कांतपुरम के बयान के बाद केरल में महिलाओं की स्वतंत्रता, सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी और धार्मिक मान्यताओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है। एक तरफ बयान को धार्मिक दृष्टिकोण के तौर पर देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सतीशन जैसे नेताओं ने इसे प्रगतिशील समाज की सोच के खिलाफ बताया है। विवाद के बीच महिलाओं की सामाजिक और सार्वजनिक भूमिका को लेकर बहस अब राजनीतिक मंच तक पहुंच गई है।

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