Karur Stampede Case: तमिलनाडु में करूर हादसे पर बढ़ी कानूनी लड़ाई, TVK सरकार ने SC का खटखटाया दरवाजा

Karur Stampede Case: तमिलनाडु के करूर हादसे में 41 लोगों की मौत के बाद शुरू हुआ विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। TVK सरकार ने मृतकों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के फैसले पर हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने का फैसला किया है। जानिए पूरा मामला।

तमिलनाडु में करूर हादसे पर बढ़ी कानूनी लड़ाई

Wrriten By :

Neha Mishra

Published On :

जुलाई 28, 2026

Karur Stampede Case: तमिलनाडु के करूर भगदड़ मामले में अब कानूनी लड़ाई एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। मुख्यमंत्री थलापति विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है। राज्य सरकार मंगलवार को इस संबंध में शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल करने की तैयारी में है।

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने हाल ही में करूर भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने के राज्य सरकार के फैसले को रद्द कर दिया था। कोर्ट के इस निर्णय के बाद विजय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का फैसला लिया है।

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करूर भगदड़ में गई थी 41 लोगों की जान

आपको बता दें कि, यह मामला 27 सितंबर 2025 का है, जब करूर में अभिनेता से नेता बने विजय की चुनावी रैली के दौरान भारी भीड़ के बीच भगदड़ मच गई थी। इस दर्दनाक हादसे में 41 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।

बाद में सत्ता में आने के बाद तमिलनाडु सरकार ने 10 जुलाई को मृतकों के परिवारों को राहत देने के लिए सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी। इसके तहत 31 परिवारों के सदस्यों को नियुक्ति पत्र भी सौंपे गए थे।

हालांकि, इन नियुक्तियों को जनहित याचिकाओं के माध्यम से मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं ने सरकारी नौकरियां देने के फैसले पर सवाल उठाए थे।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

मद्रास हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल शामिल थे, ने सभी नियुक्ति आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सरकारी नौकरी कोई ऐसी सुविधा नहीं है जिसे सरकार अपनी इच्छा के अनुसार वितरित कर सके। सरकारी सेवाओं में नियुक्ति योग्यता और संविधान में तय नियमों के आधार पर होनी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासनिक फैसले भावनाओं के बजाय संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार लिए जाने चाहिए। अगर हर दुर्घटना या त्रासदी के बाद इसी तरह सरकारी नौकरियां दी जाने लगीं तो भविष्य में ऐसी मांगों की संख्या बढ़ सकती है और प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति की दलील को नहीं माना

राज्य सरकार ने अपने फैसले को सही ठहराने के लिए पुराने सरकारी आदेशों का हवाला दिया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के परिवारों को दी जाने वाली अनुकंपा नियुक्तियों और करूर भगदड़ जैसे मामले की तुलना नहीं की जा सकती। कोर्ट ने विरुधुनगर पटाखा फैक्ट्री हादसे और सड़क दुर्घटनाओं जैसे अन्य मामलों का भी उल्लेख किया।

प्रभावित परिवारों के लिए कोर्ट ने दिया वैकल्पिक सुझाव

हालांकि अदालत ने हादसे में मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की। कोर्ट ने राज्य सरकार को सुझाव दिया कि प्रभावित परिवारों के योग्य सदस्यों को कौशल विकास, तकनीकी प्रशिक्षण और रोजगार से जुड़े अवसर उपलब्ध कराए जाएं। अदालत का कहना था कि लंबे समय तक आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण और उद्यमिता को बढ़ावा देना सरकारी नौकरी देने से अधिक प्रभावी समाधान हो सकता है।

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विजय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने का किया ऐलान

हाई कोर्ट के फैसले के बाद TVK सरकार ने स्पष्ट किया कि वह इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी। सरकार का कहना है कि पीड़ित परिवारों की सहायता के लिए लिया गया फैसला उचित था और वह इसे जारी रखने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेगी। वहीं, विजय पहले भी करूर भगदड़ को लेकर तत्कालीन DMK सरकार पर गंभीर आरोप लगा चुके हैं। इस मामले की जांच CBI कर रही है और इसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जा रही है। अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं।