July Revolution Bangladesh: साल 2024 में बांग्लादेश में हुए जुलाई आंदोलन को दबाने के लिए की गई अंधाधुंध फायरिंग के मामले में अब बड़ा फैसला सामने आया है। करीब डेढ़ साल बाद ढाका स्थित इंटरनेशनल क्राइम्स कोर्ट ने इस मामले में उस समय के ढाका पुलिस चीफ समेत कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई है। यह फैसला आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर ऐतिहासिक माना जा रहा है।
किन पुलिस अधिकारियों को मिली मौत की सजा
कोर्ट ने पूर्व ढाका पुलिस कमिश्नर हबीबुर रहमान, पूर्व जॉइंट कमिश्नर सुदीप कुमार चक्रवर्ती और पूर्व ADC (रमना) शाह आलम मोहम्मद अख्तरुल इस्लाम को मौत की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने इन तीनों अधिकारियों की संपत्ति जब्त करने का भी आदेश दिया है। कोर्ट के अनुसार, ये अधिकारी जुलाई आंदोलन के दौरान चंखरपुल इलाके में हुई गोलीबारी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार पाए गए।
चंखरपुल हत्याकांड का मामला
यह सजा चंखरपुल इलाके में हुए उस हत्याकांड के लिए दी गई है, जिसमें छह प्रदर्शनकारियों की मौके पर ही मौत हो गई थी। कोर्ट ने माना कि पुलिस कार्रवाई न तो आत्मरक्षा में थी और न ही कानून के दायरे में। जांच में सामने आया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को कुचलने के लिए जानबूझकर घातक बल का इस्तेमाल किया गया।अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि मौत की सजा पाए सभी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी फिलहाल फरार हैं। बांग्लादेश सरकार ने इन अधिकारियों को भगोड़ा घोषित कर दिया है। प्रशासन का कहना है कि दोषियों को गिरफ्तार कर सजा लागू करने के लिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से भी सहयोग मांगा जाएगा।
शेख हसीना पर भी लग चुका है आरोप
गौरतलब है कि जुलाई आंदोलन को दबाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना पर भी गंभीर आरोप लगे थे। उन्हें भी इससे पहले ढाका की इंटरनेशनल कोर्ट द्वारा मौत की सजा सुनाई जा चुकी है। हालांकि, सत्ता से हटने के बाद शेख हसीना भारत की राजधानी नई दिल्ली में राजनीतिक शरण लिए हुए हैं।जुलाई-अगस्त 2024 में बांग्लादेश में आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन की शुरुआत हुई थी। शुरुआत में यह आंदोलन सीमित था, लेकिन जल्द ही यह पूरे देश में फैल गया और सरकार विरोधी विद्रोह में तब्दील हो गया। हालात बिगड़ने पर पुलिस को सड़कों पर उतारा गया और प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया गया।
कोर्ट का अंतिम फैसला
ढाका के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने सोमवार को इस बहुचर्चित मामले में फैसला सुनाया। पूर्व असिस्टेंट कमिश्नर मोहम्मद इमरुल को छोड़कर सभी आरोपियों को मौत की सजा दी गई। इमरुल को छह साल की जेल की सजा सुनाई गई है। अदालत ने साफ कहा कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह कितने ही ऊंचे पद पर क्यों न रहा हो।यह फैसला बांग्लादेश के न्यायिक इतिहास में एक अहम मोड़ माना जा रहा है। जुलाई आंदोलन के दौरान हुई हिंसा को लेकर पहली बार इतने बड़े स्तर पर जवाबदेही तय की गई है। इससे यह संदेश गया है कि राज्य की ताकत का दुरुपयोग करने वालों को देर-सबेर कानून के कठघरे में खड़ा होना पड़ेगा।
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