Shashi Tharoor on Gas Crisis: पश्चिम एशिया (West Asia) में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ता तनाव अब केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रह गया है। इस महायुद्ध की तपिश अब भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी की रसोई तक पहुँचती दिख रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राजनयिक शशि थरूर ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो भारत के सामने आर्थिक चुनौतियाँ अत्यंत जटिल हो जाएंगी। थरूर के अनुसार, खाड़ी देशों से होने वाली तेल और गैस की आपूर्ति में बाधा आने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) सीधे तौर पर खतरे में पड़ सकती है।
वैश्विक संघर्ष और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर संकट
न्यूज एजेंसी से बातचीत के दौरान शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि भारत की निर्भरता खाड़ी देशों पर बहुत अधिक है। युद्ध के कारण लॉजिस्टिक्स और शिपमेंट में जो रुकावटें आ रही हैं, उनका असर अब जमीन पर दिखने लगा है। खाड़ी देशों से आने वाली गैस की सप्लाई में कमी दर्ज की गई है, जिससे न केवल औद्योगिक इकाइयाँ बल्कि ढाबे, रेस्टोरेंट और घरेलू किचन भी प्रभावित हो सकते हैं। थरूर का मानना है कि सीमित शिपमेंट के कारण आने वाले समय में एलपीजी (LPG) और एलएनजी (LNG) की किल्लत बढ़ सकती है, जो सीधे तौर पर देश की विकास दर और रोजगार पर दबाव डालेगी।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और घरेलू अर्थव्यवस्था पर बढ़ता बोझ
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। शशि थरूर ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि कच्चे तेल की कीमतें, जो पहले $64 प्रति बैरल के आसपास थीं, अब $100 से $120 प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं। तेल की इन आसमान छूती कीमतों के कारण पेट्रोल और डीजल का महंगा होना तय है। जब ईंधन महंगा होता है, तो ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर फल, सब्जी और रोजमर्रा की अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। यह स्थिति देश में महंगाई (Inflation) को अनियंत्रित कर सकती है।
कतर पर निर्भरता और वैकल्पिक गैस स्रोतों की तलाश
भारत अपनी LNG और LPG जरूरतों का लगभग 60 से 80 प्रतिशत हिस्सा कतर जैसे खाड़ी देशों से आयात करता है। वर्तमान युद्ध की स्थिति ने इस सप्लाई चेन को असुरक्षित बना दिया है। थरूर के अनुसार, यद्यपि भारत रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर कुछ राहत पा रहा है, लेकिन गैस के मामले में रूस पूरी तरह से कतर का विकल्प नहीं बन सकता। ऐसे में भारत को जल्द से जल्द नए देशों के साथ व्यापार समझौते करने होंगे और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत (Alternative Energy Resources) तलाशने होंगे ताकि भविष्य में ऐसे झटकों से बचा जा सके।
औद्योगिक मंदी और रोजगार पर गहराते बादल
यदि ईंधन और ऊर्जा का संकट लंबा चलता है, तो इसका सबसे बुरा असर देश के विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र पर पड़ेगा। फैक्ट्रियों को चलाने के लिए आवश्यक गैस और बिजली की बढ़ती कीमतें उत्पादन लागत को बढ़ा देंगी, जिससे औद्योगिक रफ्तार धीमी पड़ सकती है। उत्पादन में कमी आने से न केवल उपभोग प्रभावित होगा, बल्कि निजी क्षेत्र में रोजगार (Jobs) सृजन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। यह संकट भारत के लिए एक कड़ा रिमाइंडर है कि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और आयात के स्रोतों में विविधता लाना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।
पश्चिम एशिया का यह तनाव भारत की विदेश नीति और आर्थिक रणनीति की कड़ी परीक्षा ले रहा है। जैसा कि शशि थरूर ने रेखांकित किया, भारत को अपनी रणनीति में व्यापक बदलाव करने की जरूरत है ताकि वैश्विक अस्थिरता के बीच अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके।









