घरेलू हिंसा पर अंतरराष्ट्रीय बहस: अफगानिस्तान बनाम भारत के कानून कितने अलग?

काबुल  अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. अफगानिस्तान को चलाने वाले तालिबान ने एक नया कानून लागू किया है, जो महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा को कानूनी रूप से मान्यता देता है. इस कानून के तहत पति अपनी पत्नी और बच्चों को उस हद तक शारीरिक सजा दे सकता है, जब तक उससे हड्डी न टूटे या खुला घाव न बने. यानी हड्डी नहीं टूटी तो पीटना गलत नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार यह दंड संहिता तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा के हस्ताक्षर से लागू हुई है. यह कानून एक तरह की नई

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Published On :

फ़रवरी 20, 2026

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काबुल 

अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. अफगानिस्तान को चलाने वाले तालिबान ने एक नया कानून लागू किया है, जो महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा को कानूनी रूप से मान्यता देता है. इस कानून के तहत पति अपनी पत्नी और बच्चों को उस हद तक शारीरिक सजा दे सकता है, जब तक उससे हड्डी न टूटे या खुला घाव न बने. यानी हड्डी नहीं टूटी तो पीटना गलत नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार यह दंड संहिता तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा के हस्ताक्षर से लागू हुई है. यह कानून एक तरह की नई जाति व्यवस्था बनाता है, जिसमें सजा इस बात पर निर्भर करती है कि अपराध करने वाला व्यक्ति “आजाद” है या “गुलाम”.

अफगानिस्तान का नया क्रिमिनल कोड 

तालिबान एडमिनिस्ट्रेशन के लगाए गए नए क्रिमिनल कोड के तहत शादी के अंदर घरेलू व्यवहार को विवादित तरीके से देखा गया है. बताए गए नियमों से यह पता चलता है कि पति अपनी पत्नी या बच्चों को शारीरिक सजा दे सकता है. बशर्ते इससे हड्डियां ना टूटे या फिर खुले घाव ना हों. यह असरदार तरीके से घरों के अंदर घरेलू हिंसा के लिए कानूनी कवर देता है.

यहां तक की ऐसे मामलों में भी जहां ज्यादा जोर लगाने से हड्डियां टूट जाती हैं, सिर्फ ज्यादा से ज्यादा सजा कथित तौर पर 15 दिन की जेल तय की गई है. न्याय पाने के लिए एक महिला को जज के सामने अपनी चोट दिखानी होती है और वह भी पूरी तरह से ढके हुए रहकर और अपने पति या किसी पुरुष संरक्षक के साथ आकर.

इतना ही नहीं बल्कि कानून में यह भी कहा गया है कि अगर कोई शादीशुदा महिला अपने पति की इजाजत के बिना रिश्तेदारों से मिलने जाती है तो उसे 3 महीने तक की जेल हो सकती है. 

भारत में घरेलू हिंसा कानून 

भारतीय न्याय संहिता के मुताबिक पति या फिर उसके रिश्तेदारों द्वारा की गई  क्रूरता को एक गंभीर अपराध माना जाता है. शारीरिक का मानसिक क्रूरता के लिए 3 साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है. यह एक नॉन बेलेबल अपराध है. जिसका मतलब है कि पुलिस बिना वारंट के आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है और जमानत भी अपने आप नहीं मिलती.

घरेलू हिंसा से महिलाओं का प्रोटेक्शन एक्ट 

भारत का घरेलू हिंसा से महिलाओं का प्रोटेक्शन एक्ट शारीरिक हमले तक ही सीमित नहीं है. इसमें आर्थिक, भावनात्मक, बोलकर किया गया और मानसिक शोषण भी शामिल है. एक महिला प्रोटेक्शन ऑर्डर के लिए मजिस्ट्रेट के पास जा सकती है. उसे साझा घर में रहने का भी अधिकार है. ऐसे कोर्ट ऑर्डर का उल्लंघन करने पर 1 साल तक की जेल हो सकती है.

दहेज हत्याओं के लिए कड़ी सजा 

शादी के 7 साल के अंदर दहेज हत्या या फिर संदिग्ध मौत जैसे गंभीर मामलों में कानून में काफी कड़ी सजा का प्रावधान है. भारतीय न्याय संहिता के संबंधित प्रावधानों के तहत पति या ससुराल वालों को कम से कम 7 साल तक की जेल हो सकती है. इतना ही नहीं बल्कि दोषी पाए जाने पर उम्र कैद तक बढ़ सकती है.

लोग बोलने से डर रहे

द इंडिपेंडेंट के अनुसार, मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि लोग इस कानून के खिलाफ गुप्त रूप से भी बोलने से डर रहे हैं. इसकी वजह यह है कि तालिबान ने नया आदेश जारी किया है, जिसमें इस कानून पर चर्चा करना भी अपराध बताया गया है. अफगानिस्तान का मानवाधिकार संगठन रवादारी, जो देश से बाहर रहकर काम करता है, ने एक बयान में संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अपील की है कि इस आपराधिक प्रक्रिया संहिता को तुरंत लागू करने से रोका जाए और इसे रोकने के लिए सभी कानूनी उपाय अपनाए जाएं.

महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिनिधि रीम अलसालेम ने एक्स पर लिखा कि इस नए कानून का महिलाओं और लड़कियों पर असर बेहद डरावना है. तालिबान यह अच्छी तरह समझ चुका है कि उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है. सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय उन्हें गलत साबित करेगा, और अगर करेगा तो कब.

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