India Slams Pakistan : आतंकवाद, धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर पाकिस्तान की भूमिका एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान के रुख पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर और भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने से पहले पाकिस्तान को अपने यहां की परिस्थितियों पर ध्यान देना चाहिए। भारत की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने धार्मिक स्वतंत्रता और अंतिम संस्कार के अधिकार से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के दौरान पाकिस्तान के दावों को चुनौती दी।
असाधारण परिस्थितियों में अंतिम संस्कार के अधिकार पर चर्चा
भाविका मंगलानंदन ने ‘असाधारण परिस्थितियों में अंतिम संस्कार के अधिकारों’ विषय पर धर्म या विश्वास की स्वतंत्रता से संबंधित विशेष प्रतिवेदक के साथ हुई बातचीत में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने रिपोर्ट में उठाए गए मुद्दों और उसके दृष्टिकोण पर सवाल खड़े किए। भारत की ओर से उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों जैसे संवेदनशील विषयों पर चर्चा करते समय सभी देशों की परिस्थितियों का निष्पक्ष आकलन किया जाना चाहिए। किसी एक क्षेत्र या समूह को जिम्मेदार ठहराकर व्यापक तस्वीर को नजरअंदाज करना उचित नहीं है।

कोविड काल की घटनाओं पर रिपोर्ट के दृष्टिकोण पर सवाल
भाविका ने कहा कि रिपोर्ट में कोविड-19 महामारी के दौरान हुई गलत प्रथाओं के लिए मुख्य रूप से ‘ग्लोबल साउथ’ को जिम्मेदार ठहराया गया है। उनके अनुसार, महामारी के दौरान विकसित देशों में भी अंतिम संस्कार और मृतकों के सम्मान से जुड़ी गंभीर परिस्थितियां सामने आई थीं, लेकिन रिपोर्ट में उन घटनाओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने इस तरह के चयनात्मक दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए कहा कि मानवाधिकारों के मुद्दों का मूल्यांकन निष्पक्षता और समान मानकों के आधार पर होना चाहिए। उनके बयान का मुख्य संदेश था कि किसी भी देश या क्षेत्र के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए।
आतंकवादियों के अधिकारों की पैरवी पर भारत की आपत्ति
भारतीय प्रतिनिधि ने चर्चा के दौरान आतंकवाद और मानवाधिकारों के बीच संबंध का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में उन आतंकवादियों के अधिकारों की पुरजोर वकालत की गई है, जो दूसरों के सबसे बुनियादी मानवाधिकार यानी जीवन के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। भारत ने इस दृष्टिकोण पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मानवाधिकारों की चर्चा में आतंकवाद के पीड़ितों और उनके परिवारों के अधिकारों को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए। भारत का तर्क था कि मानवाधिकारों की रक्षा की बात करते समय हिंसा और आतंकवाद से प्रभावित लोगों की पीड़ा को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

कारगिल युद्ध का हवाला देकर पाकिस्तान को घेरा
भाविका मंगलानंदन ने पाकिस्तान के रुख को विडंबनापूर्ण बताते हुए 1999 के कारगिल युद्ध का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय पाकिस्तान अपने मारे गए सैनिकों के शवों को स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं था, जबकि आज वही देश आस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और दफनाने के अधिकारों पर जोर दे रहा है। भाविका ने याद दिलाया कि भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान कई पाकिस्तानी सैनिकों के शवों को पूरे सैन्य सम्मान और इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दफनाया था। इस उदाहरण के जरिए उन्होंने पाकिस्तान के मौजूदा रुख और उसके पुराने व्यवहार के बीच अंतर को रेखांकित किया।
जम्मू-कश्मीर पर टिप्पणी करने से पहले अपने क्षेत्र पर ध्यान देने की सलाह
भाविका ने पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर को लेकर उसके रवैये पर भी घेरा। उन्होंने कहा कि भारत के केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर पर लगातार टिप्पणी करने के बजाय पाकिस्तान को अपने अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के हिस्सों में विकास और लोगों की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने रावलकोट जैसे क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान से अपने नियंत्रण वाले इलाकों की समस्याओं पर गौर करने की बात कही। भारत लंबे समय से पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराता रहा है और उन्हें जम्मू-कश्मीर का हिस्सा मानता है।

अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर पाकिस्तान पर सवाल
भारतीय प्रतिनिधि ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में कई अल्पसंख्यक समुदायों की आबादी घटने और उनके अधिकारों के उल्लंघन को लेकर चिंताएं सामने आती रही हैं। भाविका के अनुसार, जो देश अपने यहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अधिकारों को सुनिश्चित नहीं कर पाता, उसे दूसरे देशों को मानवाधिकारों पर उपदेश देने से पहले अपने रिकॉर्ड पर विचार करना चाहिए।
भारत का संदेश: मानवाधिकारों पर दोहरे मानदंड स्वीकार नहीं
इस चर्चा में भारत ने धार्मिक स्वतंत्रता, मृतकों के सम्मान, आतंकवाद और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को एक व्यापक मानवाधिकार दृष्टिकोण से देखने की जरूरत पर जोर दिया। भाविका मंगलानंदन के बयान का उद्देश्य पाकिस्तान के दावों पर सवाल उठाने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर समान मानदंड अपनाने की मांग करना था। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया कि मानवाधिकारों की बात करते समय आतंकवाद के पीड़ितों, अल्पसंख्यकों और सभी प्रभावित समुदायों के अधिकारों को समान महत्व मिलना चाहिए।
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