India GDP Forecast: पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच गहराते तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत की आर्थिक विकास दर के लिए भी चिंताजनक स्थिति पैदा कर दी है। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता का सबसे सीधा असर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पड़ रहा है, जिसमें निरंतर उछाल दर्ज की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और एशियाई विकास बैंक (ADB) दोनों ही प्रमुख वैश्विक वित्तीय संस्थानों ने इस स्थिति का आकलन करते हुए भारत की विकास दर (GDP Growth Rate) के अनुमानों में कटौती कर दी है। संस्थानों का स्पष्ट मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में यह संघर्ष लंबी अवधि तक खिंचता है, तो भारत को ऊर्जा आयात के मोर्चे पर भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और भारत पर आर्थिक दबाव
भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। वैश्विक बाजारों में तेल की कीमतों का उच्च स्तर पर बना रहना भारत के लिए दोहरी मार के समान है। एक तरफ, यह घरेलू बाजार में महंगाई को बढ़ावा देता है, जो आम जनता की क्रय शक्ति को सीधे प्रभावित करती है; वहीं दूसरी तरफ, यह भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी बोझ डालता है और रुपये के अवमूल्यन का कारण बनता है। इन सभी कारकों का सामूहिक प्रभाव यह है कि भारत की आर्थिक प्रगति की रफ्तार सुस्त पड़ रही है, जिसे IMF और ADB की नवीनतम रिपोर्टों में गंभीरता से रेखांकित किया गया है।
IMF का अनुमान: भारत की वृद्धि दर अब 6.4% रहने के आसार
IMF की ताजा ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक’ रिपोर्ट ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है। गौरतलब है कि अप्रैल 2026 में इसी संस्थान ने भारत की वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था। हालांकि, IMF ने एक सकारात्मक संकेत भी दिया है कि तमाम चुनौतियों के बावजूद, भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। साथ ही, रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2027-28 के लिए उम्मीद जताई गई है कि भारत की जीडीपी ग्रोथ बढ़कर 6.7 प्रतिशत हो सकती है, जो पहले के 6.5 प्रतिशत के अनुमान से बेहतर है।
ADB की कटौती: ऊर्जा निर्भरता बनी विकास में बड़ी बाधा
एशियाई विकास बैंक (ADB) ने भी IMF की तर्ज पर भारत की जीडीपी वृद्धि के अनुमान को संशोधित करते हुए इसे 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। ADB की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आयात पर अत्यधिक ऊर्जा निर्भरता और कच्चे तेल व गैस की बढ़ती कीमतों का सीधा दबाव अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र पर पड़ रहा है। इस आर्थिक दबाव के कारण भारतीय उपभोक्ताओं में खर्च करने की प्रवृत्ति कम हो रही है, जिससे मांग में कमी आई है। खपत का यह धीमापन भविष्य में ग्रोथ रेट को और अधिक प्रभावित कर सकता है।
वैश्विक मंदी का साया: दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी दवाब
केवल भारत ही नहीं, बल्कि संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था भी इस संकट से जूझ रही है। IMF ने वर्ष 2026 के लिए वैश्विक विकास दर का अनुमान 3.5 प्रतिशत से घटाकर 3.1 प्रतिशत कर दिया है। इसी प्रकार, ADB ने भी चेतावनी दी है कि पश्चिम एशिया का यह संघर्ष विशेष रूप से विकासशील एशियाई देशों की जीडीपी पर नकारात्मक असर डालने वाला है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम होती मांग और बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव आने वाले समय में विश्व व्यापार के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं, जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं को संभलकर चलने की आवश्यकता है।










