Holi 2026: देशभर में 4 मार्च 2026 को होली का पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा। जहां उत्तर भारत में यह त्योहार प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ा है, वहीं दक्षिण भारत में होली भगवान शिव और कामदेव से संबंधित है। कर्नाटक के रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर में होली का उत्सव पांच दिन तक चलता है और यहां काशी की तरह रंगों की बजाय राख से होली खेलने की परंपरा है।
गर्भगृह में शिव और कामदेव के दर्शन

यह मंदिर दक्षिण भारत का पहला ऐसा स्थल है, जहां गर्भगृह में भगवान शिव और कामदेव एक साथ विराजमान हैं। मान्यता है कि होली के दिन इन दोनों के दर्शन करने से पाप और अहंकार का नाश होता है। मंदिर में कामदेव की प्रतिमा शिवलिंग के साथ स्थापित है और ध्यान की अवस्था में दिखाई देती है।
पौराणिक कथा से जुड़ा इतिहास
कथा के अनुसार, देवी सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव कठोर तपस्या में लीन हो गए थे। सृष्टि की स्थिति बिगड़ने पर देवताओं ने कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने के लिए भेजा। कामदेव ने महादेव पर कामबाण चलाया, जिससे उनकी तपस्या भंग हुई। क्रोधित होकर शिव ने तीसरा नेत्र खोला और कामदेव राख में बदल गए। यह घटना कामदेव के अहंकार के अंत का प्रतीक मानी जाती है।
राख का महत्व
इसी कथा के कारण आज भी इस मंदिर में होली के दिन राख को माथे पर लगाया जाता है। यह राख कामदेव के अहंकार का प्रतीक है और लोगों को याद दिलाती है कि अहंकार का अंत निश्चित है।
पांच दिन का आयोजन
रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर में होली का उत्सव पांच दिन तक चलता है। हर दिन अलग-अलग अनुष्ठान होते हैं। इन दिनों में कामदेव और भगवान शिव पर चांदी की वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं, जिनमें चांदी का पालना विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्ति यदि इस समय चांदी का झूला अर्पित करते हैं, तो उनकी मनोकामना पूरी होती है।
कर्नाटक का यह अनोखा उत्सव दर्शाता है कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि भक्ति, परंपरा और पौराणिक कथाओं से जुड़ा एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव भी है। रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर की राख वाली होली हमें यह संदेश देती है कि अहंकार का अंत निश्चित है और जीवन में विनम्रता ही सबसे बड़ी शक्ति है।
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