Haryana News: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश महाबीर सिंह सिंधु का निधन न केवल न्यायिक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है, बल्कि यह कानून के प्रति समर्पित एक युग के अंत का प्रतीक है। जस्टिस सिंधु केवल एक न्यायाधीश नहीं थे, बल्कि वे संवैधानिक मूल्यों के सजग प्रहरी और मानवीय संवेदनाओं के पक्षधर थे। उन्होंने अपने न्यायिक करियर में ऐसे ऐतिहासिक और नजीर पेश करने वाले निर्णय दिए, जिन्होंने न केवल कानून की व्याख्या को नई दिशा दी, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक अधिकारों को भी मजबूत किया।
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किसान परिवार से न्यायपीठ तक
4 अप्रैल 1967 को हिसार (हांसी) के मसूदपुर गांव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे महाबीर सिंह सिंधु का जीवन संघर्ष और सफलता की मिसाल है। गांव के सरकारी स्कूल से अपनी शिक्षा की शुरुआत करने वाले जस्टिस सिंधु ने पंजाब विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की। वकालत के दौरान उन्होंने भारत और हरियाणा-पंजाब सरकारों के साथ चंडीगढ़ प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण कानूनी दायित्वों का निर्वहन किया। 2017 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में उनकी नियुक्ति उनकी कड़ी मेहनत और कानूनी दक्षता का परिणाम थी। अपने ऊंचे पद पर पहुंचने के बावजूद, उनका सरल व्यक्तित्व और समाज-गांव से जुड़ाव हमेशा बरकरार रहा।
न्यायिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के रक्षक
जस्टिस सिंधु के फैसलों में ‘न्यायिक स्वतंत्रता’ की स्पष्ट झलक मिलती थी। पीएमएलए (PMLA) से जुड़े मामलों में उन्होंने यह स्थापित किया कि विशेष अदालतें केवल जांच एजेंसियों के कहने पर रिमांड मंजूर नहीं कर सकतीं। उन्होंने प्रत्येक आवेदन के ‘निष्पक्ष न्यायिक परीक्षण’ को अनिवार्य बनाकर न्यायपालिका की स्वायत्तता को नई मजबूती दी।
जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर उनकी टिप्पणी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बनी। उन्होंने स्पष्ट किया कि लंबी पूछताछ (14-15 घंटे) किसी भी स्थिति में सामान्य जांच प्रक्रिया नहीं कही जा सकती। उन्होंने जांच एजेंसियों को संवेदनशीलता प्रशिक्षण और पूछताछ के मानकों में सुधार की सलाह देकर नागरिक गरिमा और कानून के बीच एक संवेदनशील संतुलन स्थापित किया। एनडीपीएस (NDPS) मामलों में भी उन्होंने गिरफ्तारी से पूर्व निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के अनिवार्य पालन पर जोर दिया, जो नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक मील का पत्थर माना जाता है।
प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता पर जोर
भर्ती परीक्षाओं और सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता जस्टिस सिंधु की प्राथमिकता रही। हरियाणा लोक सेवा आयोग और कर्मचारी चयन आयोग जैसे संस्थानों को दिए गए उनके कड़े निर्देश और उन पर लगाया गया आर्थिक जुर्माना—प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ एक कड़ा संदेश था। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि प्रशासनिक उदासीनता का खामियाजा किसी भी स्थिति में आम नागरिक को नहीं भुगतना चाहिए।
एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व
वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कोडान के शब्दों में, जस्टिस सिंधु एक विनम्र, धैर्यवान और असाधारण रूप से निष्पक्ष व्यक्तित्व के धनी थे। अदालत में वे तथ्यों के गहन अध्ययन और स्पष्ट आदेशों के लिए जाने जाते थे। उनका जाना विधिक समुदाय के लिए एक ऐसी रिक्तता है जिसे भरना कठिन है।
जस्टिस महाबीर सिंह सिंधु के फैसले आने वाली पीढ़ियों के लिए विधि शिक्षा और न्यायिक विमर्श के मार्गदर्शक बने रहेंगे। उनकी न्यायप्रियता और निष्पक्षता की विरासत न केवल अदालतों की फाइलों में, बल्कि उस न्याय की अवधारणा में हमेशा जीवित रहेगी, जिसके लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
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