Haryana News: हरियाणा के अंबाला नगर निगम चुनाव में इस बार मेयर पद के लिए मुकाबला बेहद दिलचस्प और त्रिकोणीय हो गया है। एक ओर भाजपा और कांग्रेस अपने-अपने उम्मीदवारों के साथ मैदान में हैं, वहीं आजाद प्रत्याशी सोनिया रानी भी दोनों दलों को कड़ी टक्कर दे रही हैं। खास बात यह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने इस बार नए चेहरों पर भरोसा जताया है, जिससे चुनाव और भी चुनौतीपूर्ण बन गया है।
भाजपा ने 32 वर्षीय युवा उम्मीदवार अक्षिता सैनी को मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस ने 60 वर्षीय कुलविंदर कौर को टिकट दिया है। इसके अलावा 42 वर्षीय सोनिया रानी, जो पहले पार्षद रह चुकी हैं, निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में हैं। इस चुनाव को भाजपा के पूर्व मंत्री असीम गोयल और कांग्रेस विधायक निर्मल सिंह की प्रतिष्ठा से भी जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि दोनों ही नेताओं की उम्मीदवार चयन और चुनाव प्रबंधन में अहम भूमिका रही है।
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विकास कार्यों की कमी बनी मुख्य मुद्दा
अंबाला शहर में लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं की कमी एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है। कई वार्डों में सड़कों की हालत खराब है और हर साल जलभराव की समस्या लोगों को परेशान करती है। इसके अलावा प्रॉपर्टी आईडी और एनडीसी से जुड़ी समस्याओं ने भी नागरिकों को काफी परेशान किया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कार्यकाल में भाजपा की मेयर होने के बावजूद गुटबाजी के कारण विकास कार्यों में रुकावट आई। यहां तक कि तत्कालीन मेयर शैलजा सचदेवा ने भी कई बार अधिकारियों के खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। दूसरी ओर, विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के विधायक बनने के बाद भी शहर के विकास में खास बदलाव नहीं दिखा। ऐसे में जनता दोनों ही दलों के कामकाज को परख चुकी है।
भितरघात और बागी नेताओं का असर
इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों को भितरघात का डर सता रहा है। भाजपा की पूर्व मेयर शैलजा सचदेवा की चुनावी गतिविधियों में सक्रियता कम नजर आ रही है, जिससे पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चा है। वहीं कांग्रेस में भी विभिन्न गुटों के बीच मतभेद हैं, जो उम्मीदवार के लिए चुनौती बन सकते हैं।
इसके अलावा भाजपा से टिकट न मिलने के बाद कई नेता बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे पार्टी के वोट बैंक पर असर पड़ सकता है। यह स्थिति चुनाव को और भी रोचक और अनिश्चित बना रही है।
जातीय समीकरण और वोट बैंक की राजनीति
अंबाला के इस चुनाव में जातीय समीकरण भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा ने सैनी समाज से युवा उम्मीदवार उतारकर अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने की कोशिश की है। वहीं कांग्रेस ने पंजाबी सैनी उम्मीदवार को मैदान में उतारकर इस समीकरण को चुनौती दी है।
अंबाला शहर में पंजाबी समाज की अच्छी खासी संख्या है, जिसे ध्यान में रखते हुए भाजपा ने नामांकन के दौरान केंद्रीय मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा को भी बुलाया था। इससे यह साफ है कि दोनों ही दल हर वर्ग को साधने की कोशिश में जुटे हैं।
जनता की उम्मीदें और चुनौतियां
शहर के लोगों को इस बार चुनाव से काफी उम्मीदें हैं। बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रोहित जैन का कहना है कि शहर में कई बड़ी परियोजनाएं लंबे समय से अटकी हुई हैं और जलभराव जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है। इसके साथ ही नगर निगम में भ्रष्टाचार के आरोप भी जनता के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। ऐसे में जो भी उम्मीदवार जीत हासिल करेगा, उससे पारदर्शी प्रशासन और ठोस विकास कार्यों की उम्मीद की जा रही है।









