Haryana News: भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कैग) की हालिया रिपोर्ट ने हरियाणा सरकार की डिजिटल प्रणालियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संविधान के अनुच्छेद 151 के तहत राज्यपाल को प्रस्तुत और विधानसभा के पटल पर रखे जाने के लिए तैयार इस रिपोर्ट (प्रतिवेदन संख्या 3) में ई-प्रोक्योरमेंट परियोजना तथा आबकारी विभाग की लाइसेंस प्रबंधन और शराब वितरण प्रणाली की गहन जांच की गई। रिपोर्ट के अनुसार, कई प्रक्रियाओं को ऑनलाइन करने के बावजूद अहम काम अभी भी मैनुअल तरीके से हो रहे हैं, जिससे वित्तीय अनियमितताएं और सुरक्षा जोखिम बढ़ गए हैं।
ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल में प्रक्रियागत और तकनीकी कमियां
ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली का मुख्य उद्देश्य सरकारी खरीद में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता बढ़ाना था, लेकिन लेखापरीक्षा में कई गंभीर विसंगतियां सामने आईं।
करार और निगरानी का अभाव: राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) के साथ अपेक्षित करार का निष्पादन नहीं हुआ और परियोजना निगरानी इकाई (पीएमयू) भी प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकी।
निविदा प्रक्रिया में हेरफेर: निविदाओं का पर्याप्त प्रचार नहीं हुआ और बोली लगाने के लिए उचित समय नहीं दिया गया। एक ही आईपी एड्रेस या एक ही संस्थान के कंप्यूटरों से बहुत कम अंतराल में अनेक बोलियां जमा होने से मिलीभगत की आशंका जताई गई है।
डेटा और वित्तीय जोखिम: पोर्टल पर निविदा चरण और मूल्यांकन सारांश अपडेट न होने से निगरानी प्रभावित हुई। इसके अलावा, बयाना राशि (EMD) की वापसी, फीस की कम-अधिक वसूली और जीएसटी प्रेषण में वित्तीय नियमों का उल्लंघन पाया गया। अपूर्ण लॉग और कमजोर पासवर्ड नीति ने सिस्टम की सुरक्षा को भी खतरे में डाला है।
आबकारी विभाग की प्रणाली में ऑटोमेशन और नियंत्रण का संकट
रिपोर्ट का दूसरा हिस्सा आबकारी विभाग की लाइसेंस प्रबंधन और शराब उत्पादन प्रणाली से जुड़ा है, जहां बड़े पैमाने पर राजस्व हानि और नियंत्रणहीनता पाई गई।
मैनुअल रिकॉर्ड और परीक्षण का जोखिम: एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल (ईएनए) के उत्पादन, उपयोग और परिवहन के लिए परमिट सिस्टम के बाहर मैनुअल रूप से जारी किए गए। रासायनिक परीक्षण की रिपोर्ट दर्ज किए बिना शराब की आपूर्ति किए जाने की संभावना बनी रही।
राजस्व और शुल्क गणना में भारी सेंध: स्टॉक ट्रांसफर फीस और अंतर आबकारी शुल्क की स्वचालित गणना न होने से राजस्व का कम उद्ग्रहण हुआ। लाइसेंसधारकों को कोटे के खुद वर्गीकरण की अनुमति देने से ₹10.37 करोड़ और न्यूनतम कोटा न उठाने पर पेनल्टी न लगने से ₹17.27 करोड़ की चपत लगी।
ट्रेजरी भुगतान में अनियमतताएं: कॉर्पस खाते में उपलब्ध राशि से अधिक आबकारी शुल्क के समायोजन और ट्रेजरी चालानों के दोहरे इस्तेमाल से लाइसेंसधारकों को अवांछित क्रेडिट मिला, जिससे सरकारी खजाने को करोड़ों का नुकसान हुआ।
साइबर सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक निर्भरता
कैग ने पाया कि विभाग राज्य के दिशा-निर्देशों के अनुरूप बिजनेस कंटिन्युइटी प्लान (बीसीपी) और डिजास्टर रिकवरी प्लान (डीआरपी) तैयार करने में विफल रहा। तकनीकी कर्मचारियों के अनिवार्य प्रशिक्षण के अभाव में सिस्टम इंटीग्रेटर पर विभाग की निर्भरता लगातार बनी हुई है। अनिवार्य साइबर सुरक्षा ऑडिट का प्रमाण भी उपलब्ध नहीं कराया जा सका।
कैग की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि केवल पोर्टल लॉन्च कर देना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल प्रशासन की सफलता के लिए एंड-टू-एंड ऑटोमेशन, मजबूत वित्तीय नियंत्रण, डेटा शुद्धता और कड़े साइबर सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करना अनिवार्य है।










