Haryana News: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने दिव्यांग सैनिकों के हित में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई सैनिक सेना में सेवा के दौरान दिव्यांग हो जाता है और उसी आधार पर उसे रिटायर किया जाता है, तो उसे दिव्यांगता पेंशन का पूरा अधिकार मिलेगा, भले ही उसने 15 वर्ष की न्यूनतम सेवा अवधि पूरी न की हो। हाईकोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार की याचिका को खारिज करते हुए सैनिकों के अधिकारों को प्राथमिकता दी।
यह फैसला उन हजारों सैनिकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है जो कम सेवा अवधि के बावजूद ड्यूटी के दौरान घायल या बीमार होकर दिव्यांग हो जाते हैं। अदालत ने कहा कि यदि दिव्यांगता का कारण सैन्य सेवा है, तो पेंशन देने से केवल सेवा अवधि के आधार पर इनकार नहीं किया जा सकता।
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केंद्र सरकार ने दी थी चुनौती
यह मामला उस समय सामने आया जब भारत सरकार ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। AFT ने अपने आदेश में सरकार को निर्देश दिया था कि लगभग नौ वर्ष तक सेवा कर चुके सैनिक को दिव्यांगता पेंशन दी जाए।
सरकार की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि संबंधित सैनिक ने केवल नौ वर्षों तक ही सेना में सेवा दी थी, जबकि पेंशन के लिए न्यूनतम 15 वर्ष की सेवा आवश्यक मानी जाती है। इसलिए वह दिव्यांगता पेंशन का पात्र नहीं है। सरकार ने यह भी कहा कि सैनिक को पहले ही उसकी दिव्यांगता के आधार पर कुछ लाभ दिए जा चुके हैं और अब सेवा अवधि को नजरअंदाज कर पेंशन देना नियमों के विपरीत होगा।
मेडिकल बोर्ड ने मानी थी सेवा से जुड़ी दिव्यांगता
मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जब सैनिक को सेवामुक्त किया गया था, तब मेडिकल बोर्ड ने उसकी बीमारी और दिव्यांगता का आकलन किया था। बोर्ड ने माना था कि सैनिक की बीमारी सेना में सेवा के दौरान बढ़ी और उसकी दिव्यांगता 30 प्रतिशत तक स्थायी रूप से प्रभावित हुई है।
इस आधार पर अदालत ने माना कि सैनिक की दिव्यांगता सीधे तौर पर सैन्य सेवा से जुड़ी हुई थी। इसलिए उसे केवल कम सेवा अवधि के आधार पर पेंशन से वंचित करना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का दिया हवाला
हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मनचंदा शामिल थे, ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि यह कानूनी मुद्दा पहले ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्पष्ट किया जा चुका है।
खंडपीठ ने ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वी.आर. नानूकुट्टन नायर’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम Court पहले ही तय कर चुका है कि सेवा के दौरान हुई दिव्यांगता की स्थिति में न्यूनतम सेवा अवधि की शर्त लागू नहीं होगी। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि स्थापित कानूनी सिद्धांतों के बावजूद केंद्र सरकार बार-बार ऐसी याचिकाएं दायर कर रही है, जो अनावश्यक कानूनी विवाद को बढ़ावा देती हैं।
सैनिकों के अधिकारों को मिली मजबूती
हाईकोर्ट का यह फैसला सशस्त्र बलों के कर्मियों के अधिकारों को और मजबूत करने वाला माना जा रहा है। इससे उन सैनिकों को राहत मिलेगी जो देश सेवा के दौरान स्वास्थ्य समस्याओं या दुर्घटनाओं का शिकार होकर समय से पहले रिटायर हो जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मिसाल बनेगा और दिव्यांग सैनिकों को न्याय दिलाने में मदद करेगा। अदालत के इस फैसले को सैनिक हितों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।










