Haryana News: रात के करीब 10 बज रहे थे और हिसार-दिल्ली हाईवे पर हांसी के पास एक ट्रैक्टर-ट्रॉली के आगे दो युवा हाथों में लालटेननुमा पवित्र ज्योत थामे आगे-आगे चल रहे थे। उनके पीछे डीजे की धीमी धुन पर भक्ति के स्वर गूंज रहे थे, जबकि आगे अंधेरे को चीरती हुई उस ज्योत की लौ उन्हें रास्ता दिखा रही थी। यह दृश्य हांसी जिले के मोहला गांव के रहने वाले 28 वर्षीय जतिन और 27 वर्षीय प्रियांशु का था। जतिन अपने गांव में खेती-किसानी संभालते हैं, वहीं प्रियांशु एक निजी फर्म में नौकरी करते हैं।
यह दोनों पिछले चार सालों से अपने दोस्तों के साथ गोगामेड़ी से गोगा महाराज की ज्योत लेकर अपने गांव लौट रहे हैं। इस बार भी उन्होंने अपनी नौकरी और काम से एक सप्ताह की विशेष छुट्टी लेकर इस गहरी परंपरा को निभाया है। शनिवार को जब वे अपनी पारंपरिक ज्योत लेकर सकुशल गांव पहुंचे, तो उनके हाथों में केवल एक ज्योत नहीं थी, बल्कि चार वर्षों से चली आ रही उस अटूट आस्था की परंपरा थी, जो अब गोगानवमी के पावन अवसर पर प्रदेश की सड़कों को एक बेहद अद्भुत और नया दृश्य दे रही है।
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सावन की शिवरात्रि जैसी कांवड़ यात्रा की तर्ज पर गोगामेड़ी यात्रा
ठीक उसी तरह जैसे सावन के महीने में शिवरात्रि पर कांवड़ यात्रा निकाली जाती है, उसी तर्ज पर अब गोगामेड़ी से पवित्र ज्योत, ध्वजा और पताका लेकर श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ अपने-अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं। इस यात्रा में कोई सैकड़ों किलोमीटर का लंबा सफर पैदल तय कर रहा है, तो कोई डाक कांवड़ की तरह तेज और अनथक कदमों से अपनी दूरी पूरी कर रहा है। गुरुग्राम जिले के सोहना से निकला श्रद्धालुओं का ऐसा ही एक समर्पित जत्था करीब 300 किलोमीटर की लंबी पैदल यात्रा करके शनिवार को हिसार जा पहुंचा।
300 किलोमीटर का कठिन सफर और संकल्प बनी ध्वजा
गुरुग्राम के सोहना स्थित शिव कॉलोनी के रहने वाले नीरज कुमार, अर्जुन, पटवारी, मुलायम, विनोद, मुंदरी, ओमचंद और सौरभ जैसे तमाम श्रद्धालु बीते दो सितंबर को गोगाजी की पवित्र ध्वजा लेकर अपने सफर पर निकले थे। करीब 300 किलोमीटर की कठिन राह को पैदल ही नापते हुए यह जत्था शनिवार को हिसार पहुंचा। इस अनूठी यात्रा की खास बात यह है कि समूह का एक युवक पूरी निष्ठा के साथ ध्वजा थामकर पैदल चल रहा है, जबकि उनके बाकी साथी ट्रैक्टर या अन्य वाहन से उनका साथ निभा रहे हैं। यात्रा के दौरान ठहरने, विश्राम करने और खाने-पीने का सारा जरूरी सामान उनके साथ ही रहता है ताकि किसी तरह की असुविधा न हो।
सड़कों पर उभरता सामूहिक आस्था और संकल्प का नया दृश्य
गोगानवमी के इन पावन दिनों में निकलने वाली इन यात्राओं में ध्वजा और ज्योत अब केवल श्रद्धा का प्रतीक नहीं, बल्कि इस पूरी यात्रा की मुख्य पहचान बन चुकी हैं। कहीं हाथों में ध्वजा थामे श्रद्धालु आगे बढ़ रहे हैं, तो कहीं जलती हुई ज्योत लेकर युवा अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं। गोगामेड़ी में मत् टेकने और धोक लगाने की यह प्राचीन परंपरा अब सड़कों पर एक बड़े सांस्कृतिक और धार्मिक विस्तार के रूप में नजर आ रही है, जिसमें यात्रा, व्यक्तिगत संकल्प और सामूहिक आस्था का सुंदर संगम एक साथ दिखाई देता है।
वाहन की यात्रा से आगे बढ़कर अब पैदल संकल्प का दौर
अपने इस आध्यात्मिक अनुभव को साझा करते हुए सोहना के नीरज कुमार बताते हैं कि यह उनकी दूसरी पैदल यात्रा है। पहले वे पारंपरिक रूप से वाहन के जरिए ही गोगामेड़ी जाया करते थे, लेकिन इस बार उनके मन में अगाध श्रद्धा का ऐसा भाव जागा कि उन्होंने पैदल यात्रा करने का कठिन संकल्प ले लिया। गोगामेड़ी पहुंचकर विधिवत धोक लगाने के बाद वे आगामी नौ सितंबर को वापस अपने घर सोहना के लिए रवाना होंगे। रास्ते की लंबी दूरी और शारीरिक थकान के बावजूद इन सभी श्रद्धालुओं का उत्साह और हौसला चरम पर है।
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