Haryana News: हरियाणा सरकार की 13 अगस्त को होने वाली महत्वपूर्ण कैबिनेट बैठक से पहले अम्बाला छावनी की फ्री होल्ड संपत्तियों से जुड़ी नीति पर राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है। ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने इस नीति की प्रस्तावित शर्तों पर कड़ी आपत्तियां जताई हैं, जिससे प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। पिछली कैबिनेट बैठक में इस नीति का प्रस्ताव लाने वाले वरिष्ठ अधिकारियों के साथ अनिल विज की एक अहम बैठक चंडीगढ़ स्थित हरियाणा सचिवालय में प्रस्तावित है। माना जा रहा है कि इस बैठक में उन तमाम पेचीदा और कठोर शर्तों पर विस्तार से मंथन होगा, जिन्हें लेकर अम्बाला छावनी के लोगों में भारी असंतोष व्याप्त है। मंत्री विज का स्पष्ट मानना है कि फ्री होल्ड नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे दशकों से अपनी ही संपत्तियों के मालिकाना हक के लिए संघर्ष कर रहे आम नागरिकों को वास्तविक और व्यावहारिक राहत मिल सके।
Haryana News: हड़ताल से पहले मंत्री अनिल विज की अहम बैठक, कई मांगों पर
क्या है 1977 के समझौते का पूरा इतिहास?
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए अनिल विज ने बताया कि 5 फरवरी 1977 तक अम्बाला छावनी का पूरा क्षेत्र कैंटोनमेंट बोर्ड के अधीन आता था। तत्कालीन रक्षा मंत्री बंसीलाल के कार्यकाल में लगभग 1063 एकड़ जमीन को छावनियों से अलग कर नगर पालिका को सौंपा गया था। इस तय व्यवस्था के तहत हरियाणा सरकार को केंद्र सरकार की इस जमीन का मालिकाना हक मिलना था और इसके बदले में सेना को 150 एकड़ मुफ्त जमीन उपलब्ध कराई जानी थी। विज के अनुसार, लंबे समय तक इस समझौते पर सही ढंग से अमल नहीं हुआ। वर्ष 2000 तक किसी भी सरकार ने इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए, लेकिन उनके अपने विशेष प्रयासों से सेना को जमीन दिलाकर समझौता पूरा कराया गया। इसके बाद संपत्तियों की रजिस्ट्री व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया, जहां पूर्ण मालिकाना हक की बजाय केवल भवन की रजिस्ट्री होने लगी और जमीन का स्वामित्व सरकार के नाम दर्ज होने लगा, जो बाद में जनता की सबसे बड़ी परेशानी बन गया।
प्रस्तावित नीति की शर्तें और अनिल विज की गंभीर आपत्तियां
अनिल विज ने स्थानीय वकीलों और विशेषज्ञों के साथ बैठकर इस नई फ्री होल्ड नीति का बारीकी से अध्ययन किया है और कई प्रमुख बिंदुओं पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है:
कलेक्टर रेट पर भारी भुगतान: नीति में पूरी जमीन की कीमत मौजूदा कलेक्टर रेट के हिसाब से वसूलने का प्रावधान है। विज का तर्क है कि यदि किसी के पास 1000 गज जमीन है और कलेक्टर रेट 60 हजार रुपये प्रति गज है, तो यह राशि करोड़ों में पहुंच जाएगी, जिसे आम और मध्यम वर्गीय परिवार चुकाने में असमर्थ हैं।
कठोर भुगतान नियम: आवेदन के वक्त ही 25 प्रतिशत राशि तुरंत और शेष 75 प्रतिशत राशि मात्र एक साल के भीतर जमा करने की शर्त रखी गई है। समय पर भुगतान न होने पर संपत्ति सील करने और सरकार द्वारा कब्जे में लेने का प्रावधान है, जिसका विज ने पुरजोर विरोध किया है।
150 साल पुराने दस्तावेज की मांग: नीति में फ्री होल्ड के लिए 150 साल पुराने मूल दस्तावेज मांगे गए हैं, जो आज के समय में अधिकांश परिवारों के पास उपलब्ध होना असंभव है। विज ने मांग की है कि बिजली बिल, प्रॉपर्टी टैक्स रसीद जैसे वैकल्पिक दस्तावेजों को स्वीकार किया जाए।
कैबिनेट में एजेंडा डिफर और जनता के पक्ष में कड़ा रुख
विज ने स्पष्ट किया कि जब यह नीति कैबिनेट में आई थी, तो उन्होंने मुख्यमंत्री के सामने कड़ा ऐतराज जताया था कि सात बार के विधायक होने के बावजूद इस महत्वपूर्ण नीति को बनाते समय उनसे कोई सलाह नहीं ली गई। उनकी आपत्ति के बाद ही इस एजेंडे को फिलहाल डिफर (स्थगित) कर दिया गया था।
अनिल विज ने अपने राजनीतिक रुख को साफ करते हुए कहा है कि उनकी पहली प्राथमिकता सरकार के स्तर पर संवाद के माध्यम से नीति में जनहितैषी बदलाव कराना है। हालांकि, यदि जनता की जायज मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो वह पूरी मजबूती के साथ जनता के साथ खड़े नजर आएंगे। अब तमाम निगाहें 11 अगस्त की उच्चस्तरीय बैठक और 13 अगस्त की कैबिनेट पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि अम्बाला छावनी के हजारों परिवारों को इस नीति से राहत मिलती है या नहीं।
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