Epstein Files Row: केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। चर्चित ‘एपस्टीन फाइल्स’ विवाद में नाम आने के बाद मचे सियासी घमासान के बीच, नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें इस मामले में पूरी तरह ‘क्लीन चिट’ दे दी है। आधिकारिक सूत्रों के हवाले से पता चला है कि केंद्र सरकार द्वारा की गई एक गहन आंतरिक जांच में हरदीप सिंह पुरी के खिलाफ कोई भी पुख्ता सबूत नहीं मिला है। जांच रिपोर्ट के अनुसार, मंत्री किसी भी प्रकार की अनैतिक या अवैध गतिविधि में संलिप्त नहीं पाए गए हैं। इस फैसले के बाद सरकार ने उन सभी कयासों पर विराम लगा दिया है जो उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठा रहे थे।
कैसे शुरू हुआ विवाद? अमेरिकी विभाग की फाइलों में आया था नाम
इस पूरे मामले की जड़ें 30 जनवरी को अमेरिकी न्याय विभाग (US Department of Justice) द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों में छिपी हैं। विभाग ने कुख्यात अपराधी जेफरी एपस्टीन से संबंधित कई संवेदनशील ईमेल्स और दस्तावेज पब्लिक किए थे, जिसमें हरदीप सिंह पुरी का नाम भी शामिल था। प्रकाशित फाइलों के मुताबिक, पुरी जून 2014 से लेकर 2017 के बीच एपस्टीन के संपर्क में थे। जैसे ही ये जानकारी सार्वजनिक हुई, भारत के राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई और विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। हालांकि, दस्तावेजों के विश्लेषण से स्थिति काफी अलग नजर आई।
ईमेल्स का खुलासा: क्या वाकई बातचीत में कुछ संदिग्ध था?
दस्तावेजों में शामिल ईमेल्स की बारीकी से जांच करने पर पता चला कि हरदीप सिंह पुरी और जेफरी एपस्टीन के बीच हुई बातचीत पूरी तरह व्यावसायिक और औपचारिक थी। ईमेल्स के अनुसार, दोनों के बीच मुख्य रूप से मीटिंग्स के शेड्यूल और भारत में व्यापारिक अवसरों (Business Opportunities) को लेकर चर्चा हुई थी। किसी भी ईमेल में किसी आपराधिक कृत्य या अनैतिक आचरण का कोई जिक्र नहीं मिला। जांच एजेंसियों ने पाया कि यह संवाद एक पेशेवर परामर्शदाता और निवेशक के बीच होने वाली सामान्य बातचीत जैसा था, जिसमें किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं किया गया था।
कालखंड का महत्व: जब पुरी किसी सरकारी पद पर नहीं थे
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू वह समय है जब यह बातचीत हुई थी। रिकॉर्ड बताते हैं कि 2014 से 2017 के दौरान हरदीप सिंह पुरी भारत सरकार के किसी भी आधिकारिक पद पर तैनात नहीं थे। उस समय वह न्यूयॉर्क में एक निजी कंपनी में कार्यरत थे। गौरतलब है कि पुरी 2014 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए थे, लेकिन उन्हें केंद्रीय कैबिनेट में सितंबर 2017 में जगह मिली थी। केंद्र सरकार ने अपनी सफाई में तर्क दिया कि एक निजी नागरिक के रूप में उनके व्यावसायिक संपर्कों को उनकी वर्तमान मंत्री पद की गरिमा के खिलाफ इस्तेमाल करना अनुचित है।
गंभीर आंतरिक जांच और अंतिम निष्कर्ष
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मोदी सरकार ने इसे हल्के में नहीं लिया। सूत्रों ने पुष्टि की है कि आरोपों के सामने आने के तुरंत बाद एक उच्च स्तरीय आंतरिक जांच समिति गठित की गई थी। इस समिति ने पुरी के पुराने रिकॉर्ड्स, पत्राचार और व्यावसायिक संबंधों की विस्तृत समीक्षा की। शुरुआती और विस्तृत, दोनों ही जांचों में हरदीप सिंह पुरी और किसी भी प्रकार की आपराधिक गतिविधि के बीच कोई लिंक नहीं पाया गया। सरकार ने स्पष्ट किया कि पुरी की छवि बेदाग है और एपस्टीन फाइल्स में उनका नाम आना केवल एक व्यावसायिक संयोग था, जिसका उनके राजनीतिक करियर से कोई लेना-देना नहीं है।
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