Greenland Row : डेनमार्क और उसके स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दबाव बढ़ने के साथ ही वैश्विक राजनीति में तनाव अपने चरम पर पहुँच गया है। ग्रीनलैंड को रणनीतिक रूप से हासिल करने की डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की इच्छा ने एक बड़े कूटनीतिक युद्ध का रूप ले लिया है। डेनमार्क के वरिष्ठ सांसदों और सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी तरह के दबाव में नहीं झुकेंगे। आर्कटिक क्षेत्र में प्रभुत्व जमाने की इस होड़ ने न केवल यूरोप और अमेरिका के रिश्तों को प्रभावित किया है, बल्कि शीत युद्ध के बाद की स्थापित वैश्विक व्यवस्था को भी चुनौती दे दी है।
रासमुस जारलोव की चेतावनी: “दो नाटो देशों के बीच युद्ध होगा मूर्खतापूर्ण”
डेनमार्क की रक्षा समिति के अध्यक्ष और सांसद रासमुस जारलोव ने अमेरिकी रुख पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। जारलोव ने साफ शब्दों में कहा कि यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर किसी भी प्रकार का सैन्य हस्तक्षेप करता है, तो डेनमार्क मूकदर्शक नहीं बना रहेगा और उसे अपनी संप्रभुता की रक्षा करनी होगी। उन्होंने इस स्थिति को ‘हास्यास्पद और विनाशकारी’ बताते हुए कहा कि दो नाटो (NATO) सहयोगी देशों के बीच युद्ध का विचार ही मूर्खतापूर्ण है। जारलोव ने याद दिलाया कि 1951 के रक्षा समझौते के तहत अमेरिका के पास पहले से ही द्वीप पर सैन्य अड्डों और खनन के अधिकार हैं, ऐसे में हमले का कोई तर्कसंगत औचित्य नहीं है।
पीएम मेटे फ्रेडरिक्सन का कड़ा रुख: नाटो के अंत की शुरुआत
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने इस विवाद को लेकर और भी सख्त लहजा अपनाया है। उन्होंने चेतावनी दी कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी सशस्त्र हमला 76 साल पुराने नाटो गठबंधन की मौत का वारंट साबित होगा। प्रधानमंत्री ने तर्क दिया कि यदि अमेरिका हमला करता है, तो डेनमार्क को नाटो के ‘अनुच्छेद 5’ (Article 5) का सहारा लेना पड़ेगा। इस अनुच्छेद के तहत, एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाता है, जिससे अन्य सदस्य देश अमेरिका के खिलाफ खड़े होने के लिए बाध्य होंगे। फ्रेडरिक्सन के अनुसार, अमेरिका इसे वीटो करेगा, जिससे नाटो की विश्वसनीयता और अस्तित्व दोनों समाप्त हो जाएंगे।
व्हाइट हाउस की रणनीति: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए “सैन्य बल” का विकल्प खुला
दूसरी ओर, वाशिंगटन में ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड को हासिल करने की अपनी जिद पर अड़ा हुआ है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड के अधिग्रहण को अमेरिका की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता मानते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन जैसे विरोधियों को रोकने के लिए अमेरिका “सैन्य बल” के उपयोग सहित सभी विकल्पों पर विचार कर रहा है। प्रशासन का तर्क है कि ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति 21वीं सदी की सुरक्षा चुनौतियों के लिए अनिवार्य है।
कूटनीति की आखिरी उम्मीद: मार्को रुबियो और आगामी वार्ता
हालांकि स्थिति तनावपूर्ण है, लेकिन कूटनीति के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संतुलन बनाने की कोशिश करते हुए कहा कि वर्तमान में अमेरिका का ध्यान ग्रीनलैंड को सैन्य रूप से जीतने के बजाय “खरीदने” और आपसी सहमति बनाने पर है। उन्होंने घोषणा की कि अगले सप्ताह डेनमार्क और ग्रीनलैंड के अधिकारियों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक होगी। डेनमार्क ने भी इसे एक “आवश्यक संवाद” करार दिया है। दुनिया भर के नेता इस वार्ता पर नजरें टिकाए हुए हैं, क्योंकि इसकी विफलता अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे को हमेशा के लिए बदल सकती है।
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