Global Economy : पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संघर्ष और ईरान-इजरायल तनाव का असर अब वैश्विक बाजारों के साथ-साथ दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर भी दिखने लगा है। जहाँ एक ओर युद्ध की अनिश्चितताओं ने अमेरिका जैसे विकसित देशों की आर्थिक रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है, वहीं दूसरी ओर भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी मजबूती और आंतरिक शक्ति के दम पर दुनिया के लिए उम्मीद की किरण बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा जारी हालिया आंकड़े इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक विकास का मुख्य इंजन बना रहेगा।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सुस्त पड़ती चाल और मंदी की आहट
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का सबसे नकारात्मक प्रभाव अमेरिका की जीडीपी ग्रोथ पर पड़ा है। 2025 की चौथी तिमाही के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे चिंताजनक हैं; इस अवधि में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर गिरकर महज 0.5% रह गई है। अगर पूरे साल 2025 की बात करें, तो अमेरिका की विकास दर 2.1% दर्ज की गई, जो 2024 के 2.8% और 2023 के 2.9% के मुकाबले लगातार गिरावट का संकेत दे रही है। रक्षा खर्च में बढ़ोतरी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान ने अमेरिकी बाजार के भरोसे को हिला दिया है।
भारत के लिए बड़ी खुशखबरी: ADB और वर्ल्ड बैंक ने बढ़ाया भरोसा
एक तरफ जहाँ पश्चिमी देश दबाव में हैं, वहीं भारत के आर्थिक गलियारों से उत्साहजनक खबरें आ रही हैं। एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) ने वित्त वर्ष 2026 के लिए भारत की विकास दर के अनुमान को संशोधित कर 6.9% कर दिया है। यह वर्ल्ड बैंक के 7.6% वाले उस अनुमान के बाद आया है, जिसने भारत को दुनिया की सबसे तेज बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था घोषित किया था। भारत के लिए अच्छी बात यह है कि अमेरिका द्वारा कुछ टैरिफ में कमी और वैश्विक निवेश का भारत की ओर मुड़ना इस विकास को नई ऊर्जा दे रहा है।
घरेलू मांग और इंफ्रास्ट्रक्चर: भारतीय विकास के दो मजबूत स्तंभ
भारतीय अर्थव्यवस्था की इस चमक के पीछे सबसे बड़ा कारण यहाँ की मजबूत घरेलू मांग है। वैश्विक मंदी के बावजूद भारत के भीतर खपत का स्तर कम नहीं हुआ है, जो सीधे तौर पर सेवा और विनिर्माण क्षेत्र को गति दे रहा है। साथ ही, केंद्र सरकार द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचे) पर किए जा रहे रिकॉर्ड पूंजीगत व्यय और निजी क्षेत्र के बढ़ते निवेश ने इकॉनमी को एक सुरक्षा कवच प्रदान किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की आत्मनिर्भरता उसे बाहरी झटकों से बचाने में सक्षम है।
पश्चिम एशिया संकट और सप्लाई चेन पर ADB की चेतावनी
हालाँकि, ADB ने अपनी रिपोर्ट में कुछ संभावित जोखिमों के प्रति आगाह भी किया है। बैंक का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष और लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। इससे न केवल भारत बल्कि पूरे एशिया में महंगाई (Inflation) बढ़ सकती है। इसके अलावा, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के सख्त होने से कर्ज महंगा हो सकता है, जिससे विकास की रफ्तार पर मामूली असर पड़ने की संभावना है। सप्लाई चेन में आने वाली बाधाएं भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौती बन सकती हैं।
वित्त वर्ष 2027 का रोडमैप: विकास की लंबी छलांग की तैयारी
भविष्य के संकेतों की बात करें तो ADB ने वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 7.3% रखा है। इस आशावाद के पीछे कई कारण हैं, जिनमें यूरोपीय संघ के साथ होने वाला संभावित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) और सरकारी कर्मचारियों की क्रय शक्ति में वृद्धि शामिल है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) थोड़ा सतर्क रुख अपनाते हुए 2027 के लिए 6.9% ग्रोथ की बात कह रहा है, लेकिन कुल मिलाकर भारत का आर्थिक प्रक्षेपवक्र (Trajectory) ऊपर की ओर ही जाता दिख रहा है।
वैश्विक आर्थिक संतुलन में बदलाव का दौर
मौजूदा वैश्विक परिदृश्य स्पष्ट रूप से सत्ता और आर्थिक प्रभाव के केंद्र में बदलाव का संकेत दे रहा है। एक समय था जब अमेरिका की छींक पूरी दुनिया को जुकाम कर देती थी, लेकिन आज भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक झटकों को सहने और दुनिया को संभालने की क्षमता दिखा रही हैं। भारत का बढ़ता कद यह सिद्ध करता है कि आने वाला दशक दक्षिण एशिया और विशेष रूप से भारत का होने वाला है।










