भोजशाला से कमाल मौला मस्जिद तक: धार में हिंदू-मुस्लिम टकराव की जड़ क्या है?

धार मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला परिसर से जुड़ी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद एक बार फिर यह विवाद चर्चा में आ गया है। सैकड़ों सालों से हिंदू और मुसलमान इस पर अपना-अपना दावा पेश करते रहे हैं। इस बीच हाई कोर्ट में एएसआई ने जो रिपोर्ट पेश की है उसमें कहा गया है कि कमाल मौला मस्जिद को मंदिर के पुराने अवशेषों से बनाया गया है। आइए नजर डालते हैं भाजशाला परिसर के एक साल के पुराने इतिहास पर। 1034 ईस्वी में भोजशाला की स्थापना 1010 से 1055 तक मालवा क्षेत्र में

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Published On :

फ़रवरी 25, 2026

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धार
मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला परिसर से जुड़ी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद एक बार फिर यह विवाद चर्चा में आ गया है। सैकड़ों सालों से हिंदू और मुसलमान इस पर अपना-अपना दावा पेश करते रहे हैं। इस बीच हाई कोर्ट में एएसआई ने जो रिपोर्ट पेश की है उसमें कहा गया है कि कमाल मौला मस्जिद को मंदिर के पुराने अवशेषों से बनाया गया है। आइए नजर डालते हैं भाजशाला परिसर के एक साल के पुराने इतिहास पर।

1034 ईस्वी में भोजशाला की स्थापना
1010 से 1055 तक मालवा क्षेत्र में राजा भोज का शासन था। इस दौरान उन्होंने 1034 में सरस्वती सदन की स्थापना की, जिसे भोजशाला भी कहा जाता है। यहां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित की गई थी।

मुस्लिम शासकों का आगमन और कमाल मौला
1305-1531- इस कालखंड में अलाउद्दीन खिलजी और दिलावर खान गोरी ने महालकदेव और गोलादेव को हराकर धार पर कब्जा कर लिया। उन्होंने राजा भोज के समय बने कई मंदिरों और स्मारकों को ध्वस्त कर दिया। इसके बाद यहां स्वतंत्र मालवा सत्नत की स्थापना की गई और भोजशाला के अधिकांश हिस्से को भी ध्वस्त कर दिया गया। यहीं 1459 में मौलना कमालुद्दीन का मकबरा भी बनाया गया जिन्हें कमाल मौला के नाम से भी जाना जाता है।

कमाल मौला का वास्तविक नाम शेख कमल अल-दीन था। वह मालवा में 14वीं शताब्दी के प्रमुख सूफी संत थे। निजामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्य रहे कमाल मौला का देहांत 1331 में हुआ था। कहा जाता है कि औलिया ने उन्हें मालवा क्षेत्र में धार और आसपास के इलाकों में इस्लाम के प्रचार के लिए भेजा गया था। कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के चेयरमैन अब्दुल समद कहते हैं कि कमाल मौला मकबरा मस्जिद और विवादित भोजशाला के करीब है।

कैसे वाग्देवी की प्रतिमा पहुंच गई लंदन
1732- में धार पर मराठा शासकों का कब्जा हो गया। 1875 में भोजशाला के पास खुदाई के दौरान वाग्देवी की प्रतिमा मिली, जिसे 1880 में एक अंग्रेज अधिकारी लेकर लंदन चला गया। तब से वाग्देवी की प्रतिमा लंदन के एक म्यूजियम में है।

फिर कैसे आई मौजूदा व्यवस्था
1909 में धार शासकों ने प्राचीन स्मारक कानून 1904 लागू किया और धार दरबार गैजेट जारी करते हुए इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया। 1934 में धार के शासकों ने यहां से अवैध अतिक्रमण हटाते हुए भोजशाला का साईनबोर्ड लगाया। 1934 में तब के धार के दीवान के नादकर ने भोजशाला को कमाल मौलाना मस्जिद घोषित किया और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी।

हिंदू मुस्लिम टकराव और ASI के हवाले भोजशाला
1944 में मौलाना कमलुद्दीन का पहला उर्स हुआ और हिंदू-मुसलमानों के बीच इस स्थल को लेकर टकराव बढ़ गया। 1952 में हिंदुओं ने बसंत पंचमी पर भोज उत्सव का आयोजन किया। 1952 में एएसआई ने भोजशाला को संरक्षित घोषित किया। 1988 में भी मरम्मत के दौरान यहां एक मूर्ति मिली थी। 1997 में धार के कलेक्टर ने शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज और बसंत पंचमी पर हिंदुओं को पूजा की अनुमति दी। अप्रैल 2003 में एएसआई ने हिंदुओं को फूल और अक्षत से हर मंगलवार को पूजा की अनुमति दी, जबकि मुसलमान शुक्रवार को नमाज अदा कर सकते हैं।

जब शुक्रवार के दिन आई बसंत पंचमी
2006 में शुक्रवार के दिन बसंत पंचमी होने की वजह से कर्फ्यू लागू करना पड़ा। कड़ी सुरक्षा के बीच दोनों समुदायों ने अपने आयोजन किए। इसके बाद 2013 में भी जब ऐसा मौका आया तो कड़ी सुरक्षा और तनाव के बीच पूजा और नमाज हुई। हालांकि,तब लोगों ने आरोप लगाया कि आम लोगों को वहां नहीं जाने दिया गया और पुलिसकर्मियों ने ही परंपरा निभाई। 2016 में भी जब ऐसा मौका आया तो वहां दोनों समुदाय के लोग आपस में भिड़ गए थे।

मार्च 2024 में सर्वेक्षण का आदेश
मध्य प्रदेश की इंदौर बेंच ने मार्च 2024 में भोजशाला परिसर में सर्वे का आदेश दिया। इसे छह महीने सप्ताह में पूरा करना था। मार्च 2024 में एएसआई ने सर्वे की शुरुआत की जो 98 दिनों तक चला। 15 जुलाई 2024 को एएसआई ने 2189 पन्नों की सर्वे रिपोर्ट मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में पेश की। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को एएसआई रिपोर्ट को खोलने और सभी पक्षों को देने को कहा। इके बाद हाई कोर्ट ने रिपोर्ट की समीक्षा शुरू की और सभी पक्षों को दो सप्ताह में अपनी आपत्तियां, विचार, सलाह, सिफारिश आदि दोनों को कहा है।

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